कविता गीत

मोर गाँव

बने रहै मोर बनी भूती ह, बनै रहै मोर गाँव,
बने रहै मोर खपरा छानही,बर पीपर के छाँव।

बड़े बिहनिहा बासत कुकरा, आथे मोला जगाये,
करके मुखारी चटनी बासी,खाये के सुरता देवाये।
चाहे टिकोरे घाम रहै या बरसत पानी असाढ़,
चाहे कपावै पू ा मांघ, महिना के ठूठरत जाड.।
ओढ़ ले कमरा खूमरी, तैहा बढाना हे पांव,
बने रहै मोर खपरा छानही, बर पीपर के छाँव।

गैंती, कुदरा, रापा, झउहा, नागर,जुवाड़ी तूतारी,
गाड़ी बइला,कोपर दतारी,जनम के मोर संगवारी।
सोझे जाथौं खेत तभो, लाढी डोरी धरे हंसिया,
मेहनत के पुजारी मैं, किसानी मोर तपस्या।
आंव बेटा मैं किसनहा के, कमिया हे मोर नाव,
बने रहै मोर खपरा छानही, बर पीपर के छाँव।

चिहूं चिहूं चहकत चिराई, सुआ मैना के बोली,
मन मोह लेथे अमरइया,के कुहकत कारी कोयली।
माता चौरा, ठाकुर देव, ठांव ठांव बिराजे देवता,
तीरथ बरथकस लागे देखेलाआबे देवत हौं नेवता।
छत्तीसगढ़ी केकोरा कथें ऐला,अऊ का तोला बतांव,
बने रहै मोर खपरा छानही, बर पीपर के छाँव।

मनोहर दास मानिकपुरी

5 thoughts on “मोर गाँव

  1. बने रहै मोर बनी भूती ह, बनै रहै मोर गाँव,
    बने रहै मोर खपरा छानही,बर पीपर के छाँव।

    दिल छुने वाला कविता हे जैसने जैसने दिवारी तीर आवत जाथे गाव सुरता आवत हे आपके कविता ले मन मढाये लागही !!हमर त गांव छूट गे संगी !!सुघ्घर रचना बर आपके जोहार!!

  2. बने रहै मोर बनी भूती ह, बनै रहै मोर गाँव,
    बने रहै मोर खपरा छानही,बर पीपर के छाँव।

    आप के तो दिवाना हो गेव
    मनोहर दास मानिकपुरी जी

  3. Geet ha bad sughhar he……PR ek geet ha yad awthe mor bhakha sang Daya Maya k sughhar havay milap re kakar hre daltev

    1. Mor bhakha ke – – – -yeh geet shayed mukund kaushal jee ka hai ..

      Manikpuri jee ke geet “hamar katek sughar ganw , jaise lachhami jee ke panw ”
      Bane surta kara dehe bhai .

  4. bahut sunder he tor rachna ha ji manohar das Manikpuri

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