कहानी

मंगत रविन्‍द्र के कहिनी ‘दुनो फारी घुनहा’

।। जीवन के सफर में जरूरत होती है एक साथी की।। ।।जैसे जलने के लिये दीप को जरूरत होती है एक बाती की।। भीख देवा ओ दाई मन…………। ओरख डारिस टेही ल सूरदास के…… जा बेटी एक मूठा चाउर दे दे, अंधवा-कनवा आय। महिना पुरे ए….. गांव म सूरदास, मांगे ल आथे। सियान ले नानकन […]

कविता गीत

किसान

धन धन रे मोर किसान, धन धन रे मोर किसान ।मैं तो तोला जांनेव तैं अस, भुंइया के भगवान ।। तीन हाथ के पटकू पहिरे, मूड म बांधे फरियाठंड गरम चउमास कटिस तोर, काया परगे करियाअन्‍न कमाये बर नई चीन्‍हस, मंझन, सांझ, बिहान । तरिया तिर तोर गांव बसे हे, बुडती बाजू बंजरचारो खूंट मां […]

कहानी

मंगत रविन्‍द्र के कहिनी ‘अगोरा’

बोर्रा….. अपन पुरता पोट्ठ हे। कई बच्छर के जून्ना खावत हे। थुहा अउ पपरेल के बारी भीतर चर-चर ठन बिही के पेड़…..गेदुर तलक ल चाटन नई देय। नन्दू के दाई मदनिया हर खाये- पीये के सुध नई राखय… उवत ले बुड़त कमावत रथे। नन्दू हर दाई ल डराय नहीं…। ददा बोर्रा हर आंखी गुड़ेरथे तभे […]

कविता

हायकू

कुकुर कोरा म घूमत हे, टूरा ह रोवत हे । किरकेट के चढे हसवै बुखार ददा बेहाल । दोरदीर ले भेंड कस झपाथे बफे म खाथे । ‘कालोनी’ रोग गॉंव म हबरागे जी दरर गे । माई-मूडी ह बनगे कहूं आन मरे बिहान । मनगरजी, सियानी, नई बॉंचै खपरा छान्‍ही । गोटियाय ल जेन हर […]

कहानी किताब कोठी

छत्तीसगढ़ी कहिनी किताब : गुलाब लच्‍छी

संगी हम आपके खातिर ‘गुरतुर गोठ’ म छत्तीसगढ के ख्यात साहित्यकार, कहानीकार श्री मंगत रविन्द्र जी के अवईया दिनन म प्रकासित होवईया कहानी संग्रह ‘गुलाब लच्छी’ के सरलग प्रकाशन करे के सोंचत हावन । इही उदीम म आज ये कहानी संग्रह के पहिली प्रस्तावना ‘दू आखर’ प्रकाशित करत हन तेखर बाद ले सरलग कुछ दिन […]

गीत वाचिक परम्‍परा

फुगडी गीत

गोबर दे बछरू गोबर दे  चारो खुंट ला लीपन दे  चारो देरनिया ल बइठन दे  अपन खाथे गूदा गूदा  मोला देथे बीजा बीजा  ए बीजा ला का करहूं  रहि जांहूं तीजा  तीजा के बिहान भाय  सरी सरी लुगरा  हेर दे भउजी कपाट के खीला  केंव केंव करय मंजूर के पीला एक गोड म लाल भाजी  […]

कविता

नरेन्‍द्र वर्मा के हाईकू

टूटगे आजमरजादा के डोरीलाज के होरी । पईसा सारनता-गोता ह घलोहोगे बेपार । मन म मयासिरावत हे, पैसाहमावत हे । बढती देखऑंखी पँडरियागेमया उडा गे । करथे तेनमरथे, कोढियेचमन फरथे । पैसा के खेलईमानदार मनपेल-ढपेल । परबुधियाबनके झन ठगाठेंगवा चटा । परगे पेटम फोरा, मुसुवा हनिकालै कोरा । पेट के सेतीशहर जाथे, उहेंपेट कटाथे । […]

समीच्‍छा

छत्तीसगढी साहित्य के सिरजन : लोकाक्षर 42

लोकाक्षर अंक 42 मिलीस । संपादकीय पढ के मन म भरोसा होइस कि छत्तीसगढी साहित्य के संरक्षण अउ संर्वधन बर लोकाक्षर परिवार के कतका सुघ्घर बिचार हे । पाछू कई बरिस ले ये पतरिका हा छत्तीसगढी साहित्य के चंदा सुरूज कस चमकत हे । छत्तीसगढी साहित्य के परिमार्जन बर सोंच मोला इही पतरिका म नजर […]

व्यंग्य

हाथी बुले गांव – गांव, जेखर हाथी तेखर नाव

नाव कमाय के मन, नाव चलाय के संऊख अउ नाव छपाय के भूख सबो झन ल रथे । ये भूख हर कउनो ल कम कउनो ल जादा हो सकथे, फेर रथे जरूर । एक ठन निरगुनिया गीत सुने बर मिलथे – नाम अमर कर ले न संगी का राखे हे तन मं । कतकोन झन […]

कविता

नेता पुरान

कोकडा कस देह उज्‍जर, करिया हे मन ।आनी बानी के बाना, धरय छन-छन ।। घेरी बेरी बदलय, टेटका कस रंग ।कोनो नई जांनय इंखर ठंग ।। हाथ लमाए हस, छुए बर अकास ।अंतस म छल-कपट सुवारथ सत्‍यानास ।। जनता के सुख दुख ले इनला का लेना ।अपन मतलब के छापत हे छेना ।। मेंछा ल […]