कविता

राज्योत्सव मेला

अँधा लंगड़ा बड़े मितानी सुने हो हौ तुम कहानी कहूँ जनम के दुनो संगवारी हो है लाग मानी भीख मांग के करे गुजारा उमन दुनो परानी इक दुसर संग मेला घुमात काट दईंन जिनगानी लंगड़ा के रहे नाम बंशी अँधा के गंगा राम धरम धाम के नाम ला लेके कर आइन चारो धाम राजिम जाके […]

कहानी

जनकवि कोदूराम ”दलित” की पुत्र वधु श्रीमती सपना निगम के नान्‍हे कहिनी

अड़हा टूरा के कहिनी हमर गाँव मा एक झन जुंवर्रा टूरा रहिस हे. मूड ला अडबड खजुवाय औ लडर-बडर गोठियावय.  ओखर मूड मा बहुत अकन ले जुंवा अउ लीख भरे राहय. एक झन मितान हा ओला बताइस – ”आज-काल जुंवा-लीख ला मारे बर नवा सेम्पू आय हे. एको बेर लगा लेते,  तोर समस्या हा हल […]

कविता

चरगोड़िया : रघुबीर अग्रवाल ‘पथिक’

चारों खुंट अंधेर अघात। पापी मन पनपै दिन रात। भरय तिजौरी भ्रस्टाचार आरुग मन बर सुक्खा भात॥ रिसवत लेवत पकड़ागे तौ रिसवत देके छूट। किसम-किसम के इहां घोटाला, बगरे चारों खूंट। कुरसी हे अऊ अक्कल हे, अउ हावय नीयत चोर बगरे हवै खजाना, जतका लूट सकत हस लूट॥ कांटा गड़िस नहरनी म हेर। जम्मो दुरगुन […]

कहानी

ढ़ूंढ़ी रक्सिन: छत्तीसगढ़ी लोककथा – 1

कोलिहा अउ बेंदरा दूनों मितान बदिन। जउन काम करैं दूनों सोंच-सोंच के जउन फ़ल गवैं दूनों बांट-बांट खांवैं। ढूंढ़ी रक्सिन एक दिन नदिया नहाय गिस तौ कोलिहा सो बेंदरा ह कहिस-” जा मितान! ओखर घर मा घुसर के सुघ्घर-सुघ्घर बने जिनिस ला खाबे, तेखर पाछू मंय जाहूं।” कोलिहा ढूंढ़ी रक्सिन के घर हबर के खावत-मेछरावत […]

अनुवाद कहानी

मिट्ठू मदरसा : रविन्द्रनाथ टैगोर के कहिनी के छत्तीसगढ़ी अनुवाद

एक ठिक मिट्ठू राहय। पटभोकवा, गावय मं बने राहय। फेर बेद नई पढ़य। डांहकय, कूदय, उड़ियाय, फेर कायदा-कानहून का होथे, नई जानय। राजा कथे ‘अइसने मिट्ठू का काम के’ कोनो फायदा तो नी हे, घाटा जरूर हे। जंगल के जमें फर मन ला थोथम डारथे। ताहन राजा-मंडी म फर फरहरी के तंगी हो जाथे। मंतरी […]

कहानी

बरीवाला के कहिनी : बंटवारा

‘मोर बंटवारा के कमती जमीन हे। बंटवारा में मिले घर-दुवार ह टूटत-फुटत हे। बड़े भइया सदाराम जेठासी काबर देबो। दूनों बरोबर-बरोबर बांटबो। मोर बंटवारा नीरस हे। सदाराम के बंटवारा सरस हे। बंटवारा दुवारा होना चाही। सरपंच ह कहिस कस खेदूराम, तुंहर बंटवारा होय सात आठ बरस बीतगे। ये सब बात ल बंटवारा के दिन गोठियाना […]