कहानी

बाल कहिनी : अइसे धरिन चोर गोहड़ी

बाल कहिनी सबो चोरी ओतके बेर होथे, जतका बेर मनखे घर ले बाहिर रथे। ओहर घातेच बिचारिस त सुध आईस, जमे चोरी मं कोनो अवइया-जवइया नइते अइसे मनखे के हात हे, जेहर घर वाला मन के अवई-जवई ला जानथे। तहांले राहुल हर अपन जहुंरिया रमेश अउ वीरेश ल संघेरिस अउ किहिस हमला चोरहा मनके चिन्हारी […]

कहानी

रूख लगाय के डाढ़ – कहिनी

एक झन पुराना बाबू कहिस रूख के बदला हमन ला रूख लगा के दिही। अब तुंहर काय विचार हे अब तुमन बतावव। गांव के पंच, सरपंच, मिलजुल के कहे लागिस। तुमन अपन अपन हाथ म बीस-बीस पेड़ तरिया के जात ले लगाहू, जेमा गांव हर पेड़ पौधा ले भरे-भरे लागय, रूख लगाय के डाढ़ हर […]

गीत

जनकवि स्व.कोदूराम’दलित’ जनम के सौ बरिस म बिसेस : ”धान-लुवाई”

चल संगवारी ! चल संगवारिन ,धान लुए ला जाई ,मातिस धान-लुवाई अड़बड़ ,मातिस धान-लुवाई. पाकिस धान- अजान,भेजरी,गुरमटिया,बैकोनी,कारी-बरई ,बुढ़िया-बांको,लुचाई,श्याम-सलोनी. धान के डोली पींयर-पींयर,दीखय जइसे सोना,वो जग-पालनहार बिछाइस ,ये सुनहरा बिछौना . गंगाराम लोहार सबो हंसिया मन-ला फरगावय ,टेंय – टुवाँ के नंगत दूज के चंदा जस चमकावय दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के,आही हंसिया-राजा […]

कहानी

कहिनी – जिनगी के खातिर

बाबा तेहा लीम बीजा ल काबर सकेले हस गा। काय करबे येला? येला न रे जगो त सौ म पच्चीस-तीस ठन ह पेड़ बनही रे! चल जल्दी बबा, तोला खाय बर देखथे, चल बेटा आवथवं। दाई बबा ह लीम बीजा सकेलथे। आघू कीहिस हे, डोकरा लाज नइए का रे लीम बीजा ल काय अपन मुड़ […]

कविता

रेमटा टुरा के करामात

जेठू के रेमटा टूरा लाकोनो का समझाए नान नान कुकुर के पिला देखे ओला बहुत दउड़ाए दुनो हाथ पसारे वोहादुनो गोड चकराए घुरुवा कचरा कांटा खुटीकहूँ  भी खुसर जाये कुकुर पिला ला धरे खातिर भाग दउड मचाएखुदे हपट के गिरे वोहा एको ठन नई सपडाए चल संगी हम पिला पकड़बोओखर दुकान लगाबो नान नान पिला […]

कहानी

सरग सुख : कहिनी

मुकुल के जीव फनफनागे। अल्थी-कल्थी लेवत सोचिस, अलकरहा फांदा म फंदागेंव रे बबा। न मुनिया संग मेंछरई न दई -ददा के दुलार। ये सरग लोक घला भुगतउल हे। ओला लागिस कुछ बुता करतेंव, नांव कमातेंव, पढ़-गुन के हुसियार बनतेंव। वोहा देवदूत ला कथे- मोला लागथे, जिनगीच हर बने रिहिसे। एक झन पोठहा गौंटिया के एकलौता […]

कविता

अरुण निगम के छत्तीसगढी गीत : मन झुमै ,नाचे ,गावै रात-दिन

मया के पहिली-पहिली चघे हे निसा,मन झुमै , नाचै , गावै रात – दिन.आवत हे,साँस-साँस जीए के मजा,मन झुमै , नाचै , गावै रात – दिन. अपने आप हांसत हौं,अपने आप रोवत हौं,आनी-बानी रँग-रँग के , सपना संजोवत हौं.पिया के ! घेरी – बेरी आवय सुरता…मन झुमै , नाचै , गावै रात – दिन . […]

कहानी

नंदिनी केहेस त मोर गांव देमार – कहिनी

आज दुखवा बबा के कुछ आरो नइ मिलत हे। बबा ल कुछु हो तो नई गे! आजेच ओखरघर के मोहाटी के कई बच्छर जुन्ना पीपर पेड़ हर जर समेत उखड़ गे हे। कहुं बबा ह उही मा चपका के… छी…छी… ये कहा मेहा अण्ड-बण्ड सोंचत हंव। बबा ल कुछु नई होवय अबहीन तो वो हा […]

कविता

अरुण कुमार निगम के छत्तीसगढी गीत : चले आबे नदी तीर मा …..

खन-खन बाजे चूरी , छन – छन बाजे पैरी ,हाय ! दूनों होगे बैरी,कइसे आवंव नदी तीर-मा ? चूरी – ला समझा दे अउ ,पैरी – ला मना ले ,मेंहदी -माहुर लगा के ,चले आबे नदी तीर-मा. बैरी ! मान गे हे चूरी अउ चुप होगे पैरी ,अब आँखी भेद खोले, कैसे आवँव नदी तीर-मा […]

व्यंग्य

अब के गुरुजी

का बतावंव बेटा, मोरो टुरा हा तोरेच कक्छा या पढ़थे रे। फेर ओ हा पढ़ई-लिखई मा कक्छा म दूसरइया नंबर मा हे अउ तयं पहिली नंबर मा। त मोर कोनहो जेवनी हाथ के अंगूठा ला कटवा देतेंव, ते मोर टुरा हा कक्छा मा पहिली नंबर मा आ जातिस रे।गुरु पूर्णिमा के दिन रिहिस। गुरु हा […]