कविता

कबिता : कइसे रोकंव बैरी मन ल

पांखी लगाके उड़ा जाथे जी, कइसे रोकंव बैरी मन ला।
छरिया जाथे मोर मति जी, घुनहा कर दीस ये तन ला।
उत्ती-बूड़ती, रक्सहूं-भंडार, चारो मुड़ा घूम आथे।
जब भी जेती मन लागथे, ये हा उड़ा जाथे॥
मन ह मन नई रहिगे, हो गे हे पखेरू।
डरत रहिथौं मैं एखर से, जइसे सांप डेरू॥
इरखा के जहरीला नख हे, छलकपट के दांत हे।
लोभ-मोह के संगी बने हे, खून से सने हाथ हे॥
हो गे हे अड़बड़ ये हा ढीठहा,
रख लेथे अपन परन ला…
पांखी लगा के….
साधु संत के संग धरेंव, ये तन ला सुधारे बर।
भजन कीतरन रोज करेंव मैं, मन के आंखी उघारे बर॥
मन के आघू बेमन होगेंव, खूब मोला तड़पाइस।
जोग-धियान के दवई पिया दे, अइसन गुरू बताइस॥
कभू परबत कभू घाटी, पार कोनो नइ पावय।
बिन लगाम के घोड़ा जइसे, मन ह भाग जावय॥
घोड़ा में लगाएंव संयम के कोड़ा,
अइसे करेंव मैं जतन ला…
पांखी लगा के…

डॉ. राजेन्द्र पाटकर ‘स्नेहिल’
268 हंस निकेतन कुसमी
द्वारा बेरला जिला दुर्ग