फिलमी गोठ

फिल्मी गोठ: फिलमी लेखक अउ पारिश्रमिक 8 नव

छत्तीसगढ़ के फिलीम उद्योग म पटकथा अउ पटकथा लेखक मन बर उदासीनता दिखाई देथे। मानदेय के कमी या फेर फोकट म पटकथा लेना लेखक मन ल निरास कर दे हावय। बने लेखक अउ बने पटकथा के कमी के कारन इही आय।
बने मानदेय के घोसना होय ले पटकथा पटा जही और छालीवुड म फिलीम के सुग्घर पंक्ति खड़ा हो जही।
जब फिलीम हा परदा म दिखथे, हीरो नाचथे, हिरवइन झूमथे, खलनायक हा मार खाथे, गीत हा हिरदे म छा जाथे बाजा हा बढ़िया-बढ़िया बाजथे त सिरतोन म मजा आ जाथे। फेर का हमन कभू वो लेखक मन के बारे म सोचे हन जउन मन बइठके अपन कल्पना के घोड़ा ला दउड़ाके एक-एक ठन घटना एक-एक सीन उतार-चढ़ाव मनोरंजन हास्य सबो ला रचथे जिंखर लक एक प्लाटिंग ले फिलीम के निरमान होथे। एक क्रम होथे फिलीम के सूटिंग शुरू होये के पहिली जइसे पहिली कथा आकार लेथे तहान पटकथा हा विस्तार लेथे तेखर बाद संवाद के बौछार होथे। का आघू कैमरा परही का पाछू कैमरा परही कब मुड़ म कैमरा आही अउ कब-कब कइसन-कइसन चित्रन हा फरिहाही ये सबो बुता हा एक लेखक के होथे जिंखर योजना अऊ लिखावट ही फिलीम के जान होथे। तेखर बाद बाकी के नम्बर आथे। एक योग्य फिलीमकार हा अपन कृति खातिर बिलकुल भी ‘रिस्क’ नइ लेवय अऊ वो मन सबले पहिली टाइट स्क्रिप्ट कहे जाथे। फिल्मी भासा म तेखर अपन पहिली गंभीरता ले धियान देथे। सबो बात बने हे फेर एक बात अभी भी तने के तने हे कि का आज छत्तीसगढ़ी फिलीम म पटकथा अउ पटकथा लेखक बर फिलीमकार मन गंभीर हें ये मोला थोरिक भुसभुसहा लागथे। काबर कि अब तक मोर करा ले कई झन निर्माता निर्देशक मन पारिश्रमिक के नाव ले भागगे हे। अइसन म एक लेखक के गुजारा कइसे चलही सोचे के बात हे। जादातर बालीवुड के छत्तीसगढीक़रण म बनत फिलीम हा लेखक कम अनुवादक जादा पैदा करत हें अउ सबले दु:ख के बात ये हरय कि कोनों ला उचित अउ उपयोगी मानदेय नई मिलत हे। आज जरूरत हे कि लेखक गीतकार अनुवादक मन ला एक बढ़िया पारिश्रमिक मिलय तबहे छत्तीसगढ़ी फिलीम म लेखक मन उहु मा स्तरीय अऊ मौलिक कवि गीतकार मन श्रेष्ठ कृति के रचना खातिर अघवाही अऊ छत्तीसगढ़ी फिलीम हा उही दिन राष्ट्रीय पुरस्कार पाही। निर्माता निर्देशक कलाकार मन के कथनी के हमरो फिलीम हा ऑस्कर जइसन पुरस्कार बर नामांकित होवय। ये जरूर सच होही।
चम्पेश्वर गोस्वामी