व्यंग्य

लड़की खोजत भंदई टूट जाय

गांव मन म पहिली मोटर गाड़ी, फटफटी नई रहिस। साइकिल घलो इक्का-दुक्का घर राहय। बिहाव के दिन आय त ये गांव ले वो गांव पता करत रेंगते घुमंय। जउन जिहां जाय बर काहे जिहें चल देंवय। येती-ओती पता करत अतेक घुमंय त नवा पहिने भंदई के धुर्रा बिगड़ जाय। भंदई टूट जय, गथना छर्री-दर्री हो जय।
पहिली अउ अब, सबो जात, समाज म लड़का के बिहाव करे बर लड़की खोजइ म कइ किसम के बेरा आय गे हे। 50-55 साल पहिली घलो समाज म बिहाव लइक लड़की कमती राहे। लड़का मन के गिनती जादा रहे। तब छत्तीसगढ़िया मन लड़का वाला मन करा पूछंय- कतका अकन खेती खार हे कतका धान होथे, कतका उन्हारी होथे, कतका सौंजिया, नौकर, गहिरा, पहाटिया लगथे, के जोड़ी बइला हे, गाय गरुआ हे, बने दूध, मही, घी घर म होथे त नहीं। कोनो किसम के रोग-राई परिवार म हावय ते नहीं। ये सब बात के जांच परख दूनो डाहर के मन करंय।
गांव मन म पहिली मोटर गाड़ी, फटफटी नई रहिस। साइकिल घलो इक्का-दुक्का घर राहय। बिहाव के दिन आय त ये गांव ले वो गांव पता करत रेंगते घुमंय। जउन जिहां जाय बर काहे जिहें चल देंवय। येती-ओती पता करत अतेक घुमंय त नवा पहिने भंदई के धुर्रा बिगड़ जाय, भंदई टूट जय। गथना छर्री-दर्री हो जय। लड़की पता करे म अतेक पछीना बोहावय के कतको लड़का कुंवारा राहत बुढ़वा हो जय। कुंवारा मर जय। बिहाव करे बर कतको झन घर बइठे बिहाव वाली, बाई, छोड़े बाई, रांडी, लइका धरे मइके म बइठे बाइ मन संग घलो बिहाव कर लेवयं।
सन् 1960-65 ले नउकरी सरकारी के मिले ले अउ पढ़ई-लिखई के बाढ़े ले बिहाव अउ लड़का-लड़की खोजे के रंग-ढंग म फरक अइस। लड़का सरकारी नौकरी (बड़े-छोटे) साहब, बाबू, इंजीनियर, डॉक्टर, ओवरसियर, मास्टर अउ अइसने काम म राहय त बहिनी संग गुरांवट बिहाव लगावंय। माई, कका, ममा के आड़ म घलो गुरांवट, तिरकुट, चरकुट बिहाव घलो जमाय जाय। गुरावंट बिहाव म थोरको पूंजी-पसरा, लेन-देन, अवइ-जवइ नौकरी-चाकरी म ऊंच-नीच हो जय त लड़ई-झगरा, ददा घर बइठइ, जइसे झगरा अउ अलग होय के लाइन बन जाय। गोहार पर जाय। जउन घर के सियान बने-बने राहंय तउन गुरांवट म कोनो किसम के कुछ बात नई आवय। वइसे जादा गुरांवट बिहाव बने-बने नई चले हे। घर वाला ल छोड़के अइसने कतको गुरांवटहिन मन दूसर ल बना-बना डरे हें।
‘लड़की खोजत भंदई टूट जय’- वाला गोठ ल आगू बढ़ाया जाय- सन् 1974-75 वाला दिन म भारत भर म परिवार नियोजन करइया अउ प्रेरणा देवइया (मोटीवेटर) दूनों झन ल इनाम बरोबर सरकारी पइसा बने दे जाय। जोर जबरदस्ती घलो चलीस। दू-तीन झन लइका वाला राहे त वोकर ऑपरेशन कर दे जाय। लइका मन लड़का राहे, चाहे लड़की। जेकर मन के लड़का-लड़का राहे तउनो मन राजी-खुशी ऑपरेशन करवा लंय। जेकर लड़की-लड़की राहय तउन मन लड़का होय के आस म अपन ल ऑपरेशन करवाय ले बचावंय। घूस घलो चलीस।
परिवार नियोजन वाला ये समय अउ गर्भ म लड़का हे त लड़की, येकर जांच म पता चले के सेती, लड़की मन के पइदइस ल रोके गीस। ये करनी के भोगई के दिन चलत हे, आय हे। लड़का वाला मन ल लड़की नइ मिलत हे। बिहाव होवत नइए। लड़की वाला मन अउ खुदे लड़की हा, बने दुलहा मिले, बने नौकरी वाला मिले, अइसे चाहत हे, अइसने चल गे हे। लड़का ह बने पढ़े-लिखे बने दुकान वाला हे, खेती किसानी बने हे। काम धंधा बने हे, मोटर गाड़ी घर म हे, तभो ले अइसना लड़का मन ल लड़की हा छांटत हे। कभू अइसे समय रिहिस, लड़का वाला मन डींड़ाभांठा, अइसने कसही, सोरम, गुजरा, सेमरी, देवादा, फंडा, दैमार, बठेना अउ कतको गांव हे, जिहां अइसन मइनखे घलो हे जउन मन लड़की देखे के नाम म इहां-उहां, बीस-बीस, पचीस-पचीस घर जांवय, एक डेढ़ घंटा बइठंय अउ दू घांव, तीन घांव, पांच घांव लड़की ल बला-बला के देखंय। चाय-नास्ता करयं अउ बतावत हन- कहिके कुछु नइ बतायं। अइसना पदोइया मन बर अब लड़की मन के गुस्सा घलो निकलत हे।
समय उल्टा आगे हे, पहिली लड़का मन के आड़ म लड़की के बिहाव लगाय जाय। अब लड़की के आड़ म लड़का मन के बिहाव लगाय के उपाय (ओखी) चल गे हे। समाज म लड़की मन के संख्या कमती असन लागत हे, रंग-रूप अउ बने-बने के चक्कर म लड़की कमती लागथे, इहां-उहां पता करो। त लड़की कमती नइए। लड़की वाला मन नौकरी देखत हें, लड़का नई देखत हें। जउन मन अपन लड़की के बिहाव लगाय हें, तउन मन, लड़का मन ल काहत हें, हमरो घर के लड़का के बिहाव लगा देतेव। ये लक्षण बतावत हे, गुरांवट बिहाव फेर बाढ़ही, दूसर जात समाज म बिहाव करे के संख्या लड़का-लड़की मन के बाड़ही। देखे जात हे सात-आठ साल होगे। पढ़ेच लिखे लड़का-लड़की मन अपन मन के दूसर जात समाज म बिहाव करत हें। ये सब बने-बने घर के लड़का-लड़की आयं। जउन मन बेंगलुरू, दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, चेन्नई, पूना, गोआ म पढ़त-लिखत हें, उहें नौकरी करथें अउ उहें बिहाव तको करत जात हें। अपन मन के। जादा-किताब पढ़इया मन ल शिक्षित कहि दे जाथे, अइसने मन बिगड़त हें। अपन जात-समाज परिवार ल ये मन कुछु नई घेंपीन। लड़की मन ल चाही, संयुक्त परिवार के सेवा हम करन, पारिवारिक आनन्द लेवन, बने-बने चिक्कन खाय-पीए रेहे-धरे के मोह, लालच ल छोड़न। छत्तीसगढ़िया मन दूसर मन बर अपन खेत म अन्न उपजाथें। इहां के मन सेवा करे ल जादा महत्व देथे। पहिली लड़की खोजत भंदई टूटे, अब पेट्रोल सिरावत हे।
बसंत कश्यप
डंगनिया पाटन, दुर्ग

One thought on “लड़की खोजत भंदई टूट जाय

  1. सुग्घर लिखे हव भाई ! फेर एला पढ़ के समाज ह चेतही ,तभे कुछु बात ह बनही.

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