व्यंग्य

जन आन्दोलन के गरेर

पापी दुस्ट आत्मा मन के नास करे बर, धरम के रक्षा करे खातिर बर बड़े-बड़े रिसी मुनि, गियानी-धियानी, बखत-बखत मा आगू अईन हे। भगवान राम के गुरु विश्वामित्र, चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य, शिवाजी के गुरु रामदास, आनंद मठ के सन्यासी जइसे उदाहरन ले इतिहास भरे पड़े हे। गुरु सऊंहत राज नई करय फेर पापी, राक्छस मन के नास करे बर बीर पुरुष मन ला तियार करथे। उन ला प्रेरना देथे।
वर्मा:- कइसे जी मिश्रा जी! ये मिस्र मा का होगे जी?
मिश्रा:- उही जऊन अब हमरो देस मा घलो होके रही। मिस्र के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के पाप के मरकी जब भर गीस त उहां जन आन्दोलन के अइसे बड़ोंरा उठीस के होस्नी मुबारक सुखाय पाना बरोबर उढ़िया गे। जे तपही ते खपही। अनियांव, अइताचार, भ्रस्टाचार, नंगरा नाच के खेल करोइया मन के इही गति होथे। मिस्र के तानासाह ले जादा हमर देस के नेता, बैपारी, अफसर अति करत हें। छानही मा होरा भूंजत हें।
वर्मा:- फेर हमर देस के जनता तो निचट जुड़ हे। कलेचुप बइठे हे। 2 जी स्पेक्टरम, कामनवेल्थ, आदर्स सोसायटी जइसे घोटाला मन ला देख के तो ऊंखर मन मा अंगार सुलग जाना रहीस। काबर कि ऊंकरे पसीना गार के कमाय धन ला भ्रस्टाचारी दोगला मन निसर्मी होके खुल्लम-खुल्ला नंगात हें। तब जनता के लहू डबकत कइसे नई हे? भइगे, जम्मो कुकरम ला टीवी मा देखत हें, गजट मा पढ़त हें, अऊ गारी बकत रहि जात हें।
मिश्रा:- वर्मा जी, ऊपर छवां तुंहर गोठ हर सच हे। फेर तुमन जानते हव- गोरसी के आगी हर तरीच तरी सुपचत रहिथे त ओकर आंच के पता नई चलय। फ्रांस के राज्य क्रांति, रूस के बोल्सेविक क्रांति कोनो एक दिन मा नई होय रहीन। अभी घलो मिस्र के जऊन करीस हे, ओहर एक दिन मा नई होईस हे। उहां घलो मुबारक के अत्याचार ला देखरेख के कोनजनी कब ले जनता के हिरदय मा आगी सुपचत रहीस हे। जब आगी बम्बर बरे लगीस त अत्याचारी ला कुरसी छोड़के भागे ला पर गे।
हमर देस ले भ्रस्टाचार अऊ बैमानी ला जड़-मूल ले उखाने खातिर बर बड़े-बड़े ईमानदार नामी मनखें, साधु-सन्यासी, बाबा, स्वामी मन संघरा जुरियात हें।
वर्मा:- फेर लोगन कहत हें के भगवा पहिरोइया मन के राजनीति मा का काम ?
मिश्रा:- वर्मा जी! पापी दुस्ट आत्मा मन के नास करे बर, धरम के रच्छा करे खातिर बर बड़े-बड़े रिसी मुनि, गियानी-धियानी, बखत-बखत मा आगू अईन हे। भगवानराम के गुरु विश्वामित्र, चन्द्रगुप्त के गुरु चाणक्य, शिवाजी के गुरु रामदास, आनंद मठ के सन्यासी जइसे उदाहरन ले इतिहास भरे परे हे। गुरु सऊंहत राज नई करय। फेर पापी, राक्छस मन के नास करे बर बीर पुरुष मन ला तियार करथे। उन ला प्रेरना देथे।
आज के जऊन सच्चा गुरु हें ऊंखर संकलप ला देख के पापात्मा थर्रावत हें। आज जनता हा अकि करइया मन ला चिन्हित करे हे। उन सोझ बाय बने रद्दा मा आ जांय त बने होही, नहीं तो जनता हर उमड़ही त भागे के ठऊर नई पाहीं।
वर्मा:- फेर जनता कब उमही? पाप के घड़ा तो छलकत हे।
मिश्रा- ऊमही। मिस्र के जनक्रांति ल सफल होत देख के ओकर परोसी देस- यमन, बहरीन, जार्डन, अल्जीरिया, युगांडा, टयूनीशिया, ईरान, इराक, मोरक्को मा घलो क्रांति के अलख जाग गेहे । पाछू 42 बच्छर ले लीबिया मा राज करोइया गद्दाफी ला घलो ये बुढ़ापा मा गद्दी छोंड़ के भागे ला परही। जर्मनी, स्पेन के हवा घलो बदलत हे। अऊ त अऊ चीन घलो सुगबगावत हे। उही हवा बोहात-बोहात हमरो देस मा आही। तब अइसे गरेर उठही जेमा गद्दार-बईमान मन सुक्खा पाना कस उड़िया जाही।
तहां फेर देस के सुख, सान्ती अऊ तरक्की के वृक्छ मन मा नवा-नवा पाना उल्होही। भारत-माता के अईलाय मुंह हरिया जाही। देस फेर ‘विश्वगुरु’ अऊ ‘सोन चिरैया’ बनही।
वर्मा:- अईसन सपना काबर देखात हो मिश्रा जी?
मिश्रा:- मनखे जब सपना देखथे, जागत सपना, तब ओला पूरा करे के उदिम घलो करथे जी! बिना सपना के बिना संकलप के, मनखे मा उछाह अईच नई सकय। जब आप मन सपना नई देखहूं, मैं हर सपना नई देखिहाैं, जनता हर सपना नई देखही, तब हम मन जुड़ाय-सितराय भुर्री बरोबर परे रहिबो। अपन किस्मत ला दोस देवत, मस्तक ला ठठात बइठें रहिबो।
वर्मा जी। अब हमला मुड़ी नई ठठाना हे। बल्कि जनता के, देस के बैरी मन के मुड़ी ला नवाना हे। अब तो कमाने वाला खाही। नंगाने वाला जाही।
नवा जमाना आही।

के.के. चौबे

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