व्यंग्य

ढ़पोरशंख के किस्‍सा : भावना श्रीवास, तखतपुर

एक झन बावहन अऊ बम्हनीन रहिस उमन अड़बड़ गरीब रहीन। एक दिन बम्हनीन ह बावहन ल कहिथे कि तुमन कुछु अइसे उपाय करा जेखर ले हमर गरीबी ह दूर हो जाय।

दूसर दिन बावहन हर जंगल म तपस्या करे बर चल दिस। ओकर तपस्या ले प्रसन्न हो के भगवान विस्नु ह दरसन दिहिस अऊ वरदान मांगे बर कहिथे त बावहन हर कथे महराज मै बड़ गरीब हव, मोर गरीबी ल दूर कर देवा। भगवान ओला एक ठन सिद्ध संख दिहिस अऊ कहिस ए संख लंग तंय जेन मांगबे- तऊन तोला मिल जाही। अब ओ बावहन ओ शंख ल लेके अपन घर बर चल दिहिस। जात-जात मुंधियार होगे त बीच म एकठन गांव म बनिया के घर रुक गे। बनिया बावहन के खूब स्वागत सत्कार करिस अऊ पूछथे कि कोन डहर के आवा था, त बावहन सबो बात ल बता दिहिस, अऊ थके तो रहिस त सूतगे, लेकिन बनिया के नींद उड़ागे। ओहर चुपे-चुप उठके अपन घर के पुरखा हाथ के पुजहाई संख ल ओकर झोली म डार के भगवान के देहे संख ल अपन घर म रख लेथे। बिहनिया बावहन अपन घर चल दिहिस। घर आके बावहन हर बम्हनीन ल संख देके कहिथे कि ये सिद्ध संख ले तय जेन मांगबे तउन मिलही। बम्हनीन बहुत खुस होगे अऊ संख ल लेके अपन मन-पसंद चीज मांगे लगिस लेकिन ओमाले कुछु नई मिलिस। बावहन हर समझगे कि हो न हो ये बनिया के करस्तानी आय। बावहन घर एक ठन ढपोर संख रहिस जेनहर न बाजत रहिस न कुछु, तेन ल धर के बावहन फेर ओ ही बनिया घर गइस बनिया फेर ओकर खूब आवभगत करिस अऊ आय के कारन पूछीस, त बावहन कहिथे कि एदरि भगवान मोला ओकर ले दुगुना मिले वाला संख देहे हावय। बनिया फेर रात के उठके सिद्ध संख ल बावहन के झोली म डार के ओर ढपोर संख ल अपन घर म धर देथे। बावहन सिद्ध संख लेके चल देथे। लालच के कारन बनिया के हाथ ले सिद्ध संख ह जाथे त जाथे ओकर पुरखा के संख ह घलो चल देथे। एकरे बर कहिथे ज्यादा लालाच झन करो जतका हे ततका म संतोस करव नहीं त बनिया कस ढपोर संख ह हाथ आही।