कविता

तीन कबिता

1 ब्रम्ह मुहूरत में उठ जाबे . धरती माँ ल कर लेबे परनाम . सुमिरन करबे अपना कुल देवता ल , लेबे अपन इष्ट देव के नाम . बिहिनिया बिहिनिया नहाके , तुलसी मैया मा दिया बारबे . एक लोटा जल , अरपन कर . एक परिकरमा लगाबे .. घर म होही, लड्डू गोपाल . […]

गोठ बात

पहुँचगिस संसद

1.- मोर ऑंसू झन गिर/ एकर पिवइया/ नी जनमिस हावय वोहर अजन्मा हावय/ ऑंखी मा भरभर भरे र सागर साही/ बोहागे ता दिखबे खाली गागर साही/ कंकड़ के चोट ले/ छलक जाए/ सागर की परिभाशा/ गलत हो जाही/ अउ तोला बोहाय के लत पड़ जाही/ कोन इहें आपन/ कोन हावय पर/ सबो एकेठन दाई/ के […]

कविता

छत्तीसगढ़िया होटल

कवि – कुबेर छत्तीसगढ राज म एक ठन, छत्तीसगढ़िया होटल बनाना हे। चहा के बदला ग्राहक मन ल, पसिया-पेज पिलाना हे। सेव के बदला ठेठरी-खुरमी, इडली के बदला मुठिया-फरा, दोसा के बदला चिला रोटी, तुदूरी के बदला अंगाकर रोटी खवाना हे। मंझनिया तात पेज, संग म अमारी भाजी, रात म दार-भात अउ इड़हर के कड़ही, […]

कविता

सात हायकू सावन के

00 बादर आगे किसान के मन कुलकुलागे। 00 नांगर धरे चलिस नगरिहा खेत बोआगे। 00 कीरा झपागे बतरकीरी आगे जी कनझागे। 00 छेना सिरागे लकडी गुंगवाय ऑंखी पिरागे। 00 दिया बुतागे कडकिस बिजली बया भुलागे। 00 बोहाय पानी खेत छलछलागे बियासी आगे। 00 होगे बियासी खेत हरियागे जीव जुड़ागे। अजय ‘अमृतांशु’ हथनीपारा वार्ड,भाटापारा जिला-बलौदाबाजार-भाटापारा (छ.ग. […]

कहानी

जयलाल कका के नाच

जयलाल कका ह फुलझर गॉव म रहिथे। वोहा नाचा के नाम्हीं कलाकार आय। पहिली मंदराजी दाउ के साज म नाचत रिहिस। अब नई नाचे । उमर ह जादा होगे हे। बुढ़ुवा होगे हे त ताकत अब कहां पुरही । संगी साथी मन घलो छूट गे हे। कतको संगवारी मन सरग चल दिन। एक्का दुक्का बांचे […]

गोठ बात

छत्तीसगढ़ मं बिहाव के रीति-रिवाज

छत्तीसगढ़ के रीति-रिवाज ह खोज अउ शोध के बिसे आय। काबर कि इहां के जम्मो संस्कृति ह कृषि संस्कृति ले गुंथाय हे। यहू बात के परमान मिलथे कि इहां के कतको संस्कृति, रीति-रिवाज ह रामायण अउ महाभारत काल ले जुड़े हे। कतको रीति-रिवाज अउ परम्परा जउन ह जनम ले लेके मरन तक गुंथाय हे वोमा […]

कहानी

इतवार तिहार

एक दिन के बात आय। मैं हर जावत रहेंव आलू बिसाय। झालो घर रटपिट-रटपिट रेंगत हबक ले एक झन मनसे मेर लड़ई खागे। काय-काय समान धरे रहिस। बंदन-चंदन झंडा ला साडा करिया। कस बाबू तैं अतका जल्दी-जल्दी काबर रेंगत हावच बइगा मोला पूछिस। मैं हर न बइगा, आलू बिसाय जावत हवं। झालो घर रांधे बर […]

गोठ बात

आवत हे राखी तिहार

आवत हे राखी तिहार सजे हे सुग्घर बाजार, रकम रकम के राखी हर डाहर राखी के बहार. रेशम धागा के दिन पहागे चांदी और सोना के राखी आगे मया के तिहार म घलो देखो बाजारवाद ह कइसे छागे.

अनुवाद कहानी

अनुवाद : आखिरी पत्ता (The Last Leaf)

मूल रचना – The Last Leaf लेखक – ओ हेनरी अनुवादक – कुबेर वाशिंगटन स्‍क्‍वायर के पश्‍चिम म एक ठन नानचुक बस्‍ती हे जेकर गली मन बेढंग तरीका ले, येती ले ओती घूम-घूम के, एक दूसर ल छोटे-छोटे पट्टी म काटत निकले हे, जउन (पट्टी) मन ह ‘प्‍लेसिज’ (पारा या टोला) कहलाथे। ये जम्‍मों ‘प्‍लेसिज’ […]