व्यंग्य

बियंग : भइंस मन के संशो

Birendra Saralरेंगत-रेंगत कारी भइंस किहिस सिरतोन मं बहिनी हमर मन के जनम तो दुहायच बर होय हावे। न चारा न पानी, एक मुठा सुख्खा पैरा ला आघू मं फेंक दिन अउ दुहत हे लहू के निथरत ले। दूध ला हमर पिला मन बर तक नइ छोड़य बेईमान मन। हमरे दूध, हमरे दही, हमरे घी अउ लेवना ला खा-खा के मोटावत हे पेटला मन अउ मटकावत हे रात दिन।
गांव के बाहिर मं परिसर छइंहा मं भूरी भइंस पघुरावत बइठे रहय। तभे खार डहर ले लहकत कारी भइंस आगे। कारी भइंस ला देख के भूरी भइंस किहिस अतेक घाम मं कहां किंजरत हस दीदी। मार मनमाने लहकत हस, आ बइठ ले थोड़किन सुस्ता ले, तब जाबे। कारी भइंस मुचमुचावत किहिस टार रे बैरी, मीठ-मीठ गोठिया के सबला बिल्होरे बर तोला गजब आथे। तोला काय हे, मनमाने पेटभरहा झड़कत हस अउ बइठे-बइठे पघुरावत हस। सुस्ती लागत हे तब अंटियात हस अउ बेरा नई पोहावत हे तब मोला बलावत हस।
भूरी भइंस खलखला के हांसिस अउ मुंहुं ला टेड़गा करके किहिस टार गोठ ला, सोझबाय बइठे ला भाथे ते बइठ, नहीं ते तोर रद्दा नाप, अंजरी अकन रंग-रंग के झन गोठिया। कारी भइंस ओकर तीर मं जाके बइठगे अउ किहिस अई, रिसागेस काय दीदी, मैंहा तो दिल्लगी करते रहेंव, ले बता अउ काला बताबे तें? मोला अड़बड़ कुंहरत हावे। नहाहूं कहिके लकर-धकर तरिया डहर रेंगत रहेंव। फेर तोर मारे ये मेरन बइठे बर लागगे।
अब दुनो भइंस मनहा बइठके सुख-दुख गोठियाय लगिन। भूरी भइंस किहिस दिनोंदिन अउ निचट करियाथस दीदी। देहे पांव निचट कमजोर होगे हावे, कुछु खाथस धुन नई खास ते भगवान जाने। पहिली-पहिली इहां आय तब तो मार हिरोइन असन दिखत रहे। अब काय जियान पड़त हावे? यादा फिकर संशो झन करेकर रे बैरी, बने खा कमा अउ सुख मं रह। अई, मुंहु म बने फेरय एंड लवली लगाते। येला गोरेपन की क्रीम कहिके टीवी वाले मन रोज गांव गोहार पारत रहिथे, नई सुने हस काय? टीवी मं रोज किसम-किसम के साबुन, तेल, क्रीम, पाउडर अउ च्वयनप्राश के विज्ञापन आवत हावे। दू-चार डब्बा बने च्वनप्राश ला खाते, रंग ह भले करिया रहय फेर देंहे पांव तो मजबूत रहितिस।
कारी भइंस ह जम्हावत किहिस, रंग-रंग झन गोठिया ओ, मोला बने नई लागय। काबर कहीं नहीं, काबर दही। सुरसा के मुंहु असन महंगाई बाढ़त हवय, तै तोला नइ दिखय। पेट भर जेवन नई मिलत हावे, एक लांघन एक फरहर जिनगी चलत होवे अउ तोला उसमान छूटत हावे। तहूं तो निचट भूरी हस तैं नई लगाते गोरेपन के क्रीम ला?
भूरी भइंस जीभ ला निकाल के एक बेर अटियाइस अउ किहिस अई, कई खेप होगे ओ पड़वा के पापा ला कहत। एको दिन महुंला ब्यूटी पार्लर लेतेव ते महुं हा हिरोइन मन बरोबर बने सुंदर दिखतेंव। कहींच नहीं ते हेयरडाई नहीं तो काली मेहंदी ला बिसाके लान तिस तै घरेच मं पैरा के पोतनी बनाके लगा डारतेंव, फेर माने तब ना? अइसने अइसने हांसी दिल्लगी के गोठ गोठियात अड़बड़ बेरा होगे।
चढ़त बेरा ला देख के कारी भइंस किहिस अड़बड़ बेरा होगे रे बैरी, मोर गोसान कहुं येती आके मोला ये मेर बइठे देखही तब मनमाने ठठा डारही। इही डहर ले तरिया मं नहावत जाहूं। तै नहा डारे हावस काय दीदी?
भूरी भइंस कलथी मारत कहिस काला नहाबे ओ, ये गांव मं जब मैहां पहिली-पहिली आयेंव तब दस ठन तरिया रिहिस होही। सबो तरिया मं मार काजर कस करिया पानी भरे रहय। नहाले मन भर के जतना नहाना हे, डुबक ले जांगर के थकत ले। हमन मंझनिया भर नवां तरिया के जलरंग पानी मं तंउरत रहन। अब तो सबो तरिया मन पटागे। लटपट मं एक ठन बांचे हवय, उहु म बस माड़ीभर पानी हावे। तहुं म जंउहर होय ये मछरी पोसइया मन के। भगवान जाने काय-काय खातू अउ दवाई डारथे पानी मं? थोड़किन पानी मं बइठबे ते मनमाने खजरी होथे, बड़े-बड़े डोमटा उपट जाथे देहे भर। ऊपरहा मं बैरी जोंक मन झपाय हावे तरिया मं सब्बो लहू ला चुहक डारिन रोगहा मन। किन्नी अउ जोंक के मारे जीना हराम होगे हावे हमर। काय दुख ला गोठियाबे ओ, पहिली अल्लार भांठा रहय गांव के बाहिर मं जेमा मार हरियर-हरियर चारा रहय, शोषण भर के चारा चरन। ठंइ चारा, ठंइ पानी। सबके देंहे छिहिल छिहिल अब तो मनखे के मारे काहीं नई बांचिन। सब्बो भांठा मं बेजा कब्जा होगे। येमन चरागन तक ला नई छोड़िन। गौठान तक ला नइ छोड़िन। हबको ते उबाकें होगे हावे। खाली हाय पइसा, हाय पइसा। कोन जनी काय करहीं अपन सात पीढ़ी बर धन ला सकेल के ते? पईसा के खातिर अतेक लूट-पाट माते हावे तैं पूछ झन, भाई ह भाई के घेंच मं छुरी चलावत हावे। मितान ह मितान के पीठ मं छुरा भाेंकत हावे। अउ उपर मं कहतेच हावे, जिनगी चर दिनिया आय। माया मोहो के चक्कर मं झन फंसव। निन्यानबे के फेर म झन पड़व। इही ला सियान मन कहिथे, चाल मं कीड़ा परे अउ भभूत मं आंखी फोड़य। प्रकृति के सबो व्यवस्था ला अपनेच मन बिगाड़त हावे अउ भगवान ला दोष देवत हावे। चन्नी मंगाय दुही के, करम ला दोष देबे ते काय फायदा? चल बहिनी कतेक दुख ला गोठियाबे। गोठ के ओर हे न छोर हे, कतकी गोठियाबे फेर सिराबे नइ करय। चल दई, दुहाय के बेरा घला होगे हावे। अतका कहिके भूरी भइंस खड़ होगे अउ दूनो झन तरिया डहर रेंगे लगिन।
रेंगत-रेंगत कारी भइंस किहिस सिरतोन मं बहिनी हमर मन के जनम तो दुहायच बर होय हावे। न चारा न पानी, एक मुठा सुख्खा पैरा ला आघू मं फेंक दिन अउ दुहत हे लहू के निथरत ले। दूध ला हमर पिला मन बर तक नइ छोड़य बेईमान मन। हमरे दूध, हमरे दही, हमरे घी अउ लेवना ला खा-खा के मोटावत हे पेटला मन अउ मटकावत हे रात दिन। हमर करम मं अइसने लिखाय हावे तब काय करबे? उपरहा मं रोगहा किन्नी अउ जोंक मन लाहो लेवत हे, चुहकत हावे लहू ला रात दिन। अरे हमू मन ला तो जियन देव रे बेईमान हो, विधाता हमू मन ला तो गढ़े हावे का, धुन ये संसार ह तुहरेंच बफौती आय?
भूरी भइंस किहिस, कंदर कंदर के गोठियाय ले कुछु नइ होवय बहिनी, इंखर हिरदे पथरा लहुटगे हावे। हिरदे के गोहार के पीरा ल पथरा कभु सुनथे का? अब तो हमू मन ला लताड़ा मारे बर अउ हुमेले बर सीखे ला पड़ही। जब तक अपन हक बर नइ लड़बो तब तक येमन अइसने दुही-दुही के हमर परान ला ले डारही, समझे। अतका कहिके दुनो भइंस अपन-अपन घर डहर रेंग दिन।

वीरेन्द्र सरल
बोड़दा (मगरलोड)

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