व्यंग्य

बड़े दाई

होवत बिहनिया गांव सन्न होगे, बड़े दाई नई रहीस सुनके मोर माथा सुखागे। बड़े दाई के सांवर चेहरा, लटी बंधाये पोनी कस फक्क सफेद बाल, अइसे लागय जइसे पटवा के रेसा के गट्ठा ल बड़े दाई ह अपन मुंड़ म खपल लेहे। ओकर बड़े – बड़े गोटारन कस आंखी मोर आंखी म झलकगे। भरे तरिया के पानी कस लहरा मारत बड़े दाई मोर आंखी म घेरी – भेरी झूले लागिस। मोर कान ल भरमा भूत धर लिस – बड़े दाई मोर नांव ल लेके बलावत हे का ?
गजब दिन बाद मै महतारी संग ननिहाल ले आयेंव। हमन अंगना ले परछी नई चढ़े पाये रहेन, मोर बेटा आगे कहत बड़े दाई दउड़गे। मोला पोटारके उठालिस। मै थोकन जाने समझे के लइक होगे रेहेंव,सरम लागिस। सट ले उतरगेंव। बड़े दाई मोर दाढ़ी ल धर -धर के चुमय-उम्म! उम्म! मै अकबकाय सोंचत बड़े दाई ल देखते रहि गेंव, ये अइसे काबर करथे कहिके। बाढेंव त समझेंव चुम्मा हर गाढ़ मया के पहिचान अउ महतारी मन अल्लार मया के माढ़ा होथे। बड़े दाई चिरई कस चिहुकें लागिस – कतेक बेरा के रेंगे रेहेव ? भूख लागत हे बेटा ? मै मुक्का के मुक्का भइगेंव , दाई कहीते रहीगे – नई लागय दीदी, नई लागय वो। बड़े दाई लकर -धकर चहा बना डारिस। एक झन लइका ल भेज के मोर बर बिसकुट घला मंगा डरिस। आ बेटा! बिसकुट खवाहूं, कटोरी म चहा रखे गोड़ लमाके बड़े दाई बइठगे। हांथ ल मोर धरके तीर डारिस, मै नई गेंव। अउ चहा कहिके बिसुरगेंव। अपन हिरदे के तलातल तरिया म पुलुसपुलवान मया भरे बड़े दाई मोर कटोरी ल चहा म भरदिस। अपन सुर म मै चहा बिसकुट खाये लगेंव। दूठन बिसकुट ल खाये पाये रहे होंहूं अउ चहा के कटोरी ल उठाके पीये ल धरे रहेंव के जम्मो चहा हं मोर गोंड़ म छलकागे। मै किकिया डरेंव। बड़े दाई धंधारपट दउड़गे – का होगे बेटा ? लकर -धकर फरिया म मोर गोड़ ल पोंछ के ओमा घीव चुपरिस, तुरत -फुरत जलन जुड़ागे। ताहने बड़े दाई कहिथे चल बेटा तोला अउ एक कटोरी चहा देवथंव आंय। बड़े दाई के कोरा म बइठे मै ओकर हांथ ले चहा बिसकुट खात सोचें लगेंव – पहिली ले बड़े दाई के कहना ल मान लेतेंव त अइसन काबर होतिस। मंघा के बरसे अउ महतारी के परोसे जेन नई अघइस तेन जनम भर नई अघावय। बड़े दाई कहूं ले आवय, कतको थके मांदे राहय, पहिली मोला पा-पोटार लेतिस तब पीछू दूसर काम बूता ल करय। …मिलय दाई! बिहनिया – बिहनिया ले एक झन भीखमंगा डेरौठी म आके बइठगे। बड़े दाई घुड़क दिस -जा अभी, बिहिनिया बिहिनिया ले तुंहर बर कोठी भरे रही कोनो। मंगइया निकलते रहिस हे, के बडे दाई तीर म आके फुस्सले कहिथे-जा पीछू आ जबे महराज, मै रहूं न। मोर बचकानी बुध म बात नई पचिस। हबरस ले जोर से पूछ परेंव – ओला पीछू काबर बलावत हस बड़े दाई ? बड़े दाई कुछु नई बोल सकिस। बगल में खडे बड़े दाउ गुर्राइस – दे देबे एकात ठन कोठी ल! कमा लेबे सरग भर पुन।
सबो झन के खेत -खार जाये के पीछू महराज ल बड़े दाई खुदे खोज लाइस। पीढ़ा म बइठाइस अउ सूपा भर गहूं ल ओकर आघू म रखके टुप – टुप पांव परलिस। महॅू ल कहिस – पांव पर ले बेटा! असीस देही। मै बड़े दाई के अदेस ल फट्ट पूरा करेंव। बड़े दाई के बिहिनिया के चुप्पी अउ बड़े दाउ के गुर्रई ह मोर समझ में अब आइस। हमर घर जोन कमाय बर आवय बिना साग -पान धरे नई जाय। पारा-परोस के इहां तक के गांव के कखरों भी घर कहीं जिनिस के कमी परगे अउ ये बात कहूं बड़े दाई के कान म पहुंचगे, समझ ले बड़े दाई वो जिनिस धरके खुदे ओकर घर पहुंच जाही। इही नाव लेके हमर बड़े दाई गांव भर म बड़े दाई कहावय। बड़े दाई सदादिन कहय – राहत ले मोर ये मोर ये, मरे के बाद खाक तोर ए। कोनो संग नई जाय, कोनो संग नई दय। मोर बेटा मोर घर मोर दुवार सब बेकार हे। एक ठन ए धरती दाई हे। जे सब ला बरोबर पालथे -पोंसथे , सबला बरोबर कोरा देथे, इही सबके बड़े दाई ये।
बड़े दाउ के सरग सिधारे के पीछू ऊँकर दुनों बेटा जीधन अउ गोरधन म बांटा होगें। बांटा के बेरा सियान मन बड़े दाई बर पांच एकड़ खेत अलग निकाल दिन। कहीन जेन बेटा हॅ बड़े दाई के देखरेख सेवा जतन ल करही उही एकर खेत -खार ल जोंतही लूही। मरे के पीछु जेन किरिया -करम करही तेने हॅं खेत म बांटा पाही। जनम के बांट – बिराज के खवइया बड़े दाई के मन नई माड़िस। महीना भर बस बड़े दाई अकेल्ला रही पाइस ताहेन चार झन सियान ल जोर के इस्टाम म लिखा दिस – मै पूरा होसो-हवास के साथ चार झन के बीच अपना इच्छा ले अपन जम्मो खेत-खार, घर -दुवार ल छोटे बेटा गोरधन के नांव करथंव। वो हा मोर जीयत भर सेवा – जतन करही। मरे के पीछू मोर सबो समपति ओकरे हो जाही – मंगतीन बाई। लिखाये के बेरा जीधन बिरोध करिस- अइसे कइसे हो जही, जीयत म जेन सेवा -जतन करही तेने ह खेत ल कमाही, फेर पीछु तो खेत -खार , जमीन -जयदाद के बांटा दूनो भाई म होना चाही। गोरधन भड़क गे – जब दाईच हॅं अपन मरजी ले ये सब काहथे, त कइसे नई होही। अच्छा , अउ मरे के पीछू तिथि – किरिया- करम घला महीं करहूं। जीधन मन मार के रहीगे। काठी निकले के तियारी होगे। सबो नता- सेैना जुरियागे हवय। गांव भर के मनखे बड़े दाई के आखरी मुॅह देखे बर सकलाये हे। गोरधन कहिथे – चलव न गा जल्दी करव, अउ कोन ल अगोरथव। गय तेन गय। अवइया आवत रही। अतका ल सुनके गांव के जुरियाये मनखे अउ जम्मो नता -सैना अकचकागे। कखरो कान ल भरोसा नई होइस। सब खुसुर -फुसुर करे लगिन। कोनो -कोनो कहीन – बड़े दाई के गये ले गोरधन बइहागे।
महीना भर पहिली के बात ये। बड़े दाई संग गली के चौरा म बईठे राहंव। गोठ बात के कोनो हाथ गोड़ तो नइ होवय। जेती ल टोरबे तेती रोटी के मुॅह हो जाथे तइसे बात परे बात निकल परिस। बड़े दाई डर्राये असन दुवारी कुती ल टहाॅंक – टहाॅंक के देखय अउ फुसुर-फुसुर बताए लगिस – बेटा। कोनो ल कहिबे झन। गोरधन हतियारा हे हतियारा। मै चकरित खागेंव। मोर कान सन्न होके ठढ़िया गे । बड़े दाई ए का काहत हे ? बड़े दाई आगु कहिथे – दिन भर भूखे लांघन रही जाहूं फेर मोला पानी बर नइ पूछय, खवई तो गजब दूर हे। मुॅह ल फारे अकबकाय मै बोट-बोट बड़े दाई के मुॅह ल देखते रही गेंव। कहिस – काला कहीबे बेटा। अभी परन दिन के बात ये। मै कही परेंव – गोरधन ! मोर मुड़ी अबड़ पिरावथे बेटा। सुनके गोरधन कलेचुप बलाके कुरिया म लेगे अउ ठाढ़ अंगरी ल देखावत मोला सीधा – सीधा कहिस – तैं मर जबे, तभो मोर गरज नइ परे हे। पइसा देबे त मैं तोर इलाज ल कराहूं। दवई-पानी का फोकट म आथे ? कोनो तोर बाप ए तेन दे दीही ? अतका ल सुनके मोर तन -मन म झुरझुरी चढ़गे। लगिस, कोनो करेंट मार दिस। फेर कोन जनी गोरधन के ओतका बात ल सुने के बेरा बड़े दाई ल कइसे लागिस होही, ओकरे आत्मा जानही। तभो ले वो जी परहीन हॅ कइसे-कइसे अतेक दिन ले जी घलो गे।
अस जलाये के पीछू संझौती बेरा जम्मो परिवार जुरियाय रहिन। गोरधन मुॅह ल ओथारे लरघियाए बइठे रहाय। कहीस – दाई के तिथि-करम ल गोठिया ले रहीतेन गा। मैं अपन आंखी के सनसनावत पानी के पूरा अउ छाती के धधकत आगी ल नई थाम सकेंव। रकमकावत उठके कहेंव – गोरधन ! तैं अपन महतारी ल जीयत भर खूब खवाए – पीयाए, सेवा – जतन करे। तोर ले पहिली वोह मोरो बड़े दाई रहीस हे , तैं फिकर झन कर, ओकर किरिया-करम ,खात-खवई ल अब मैं करहूं।

धर्मेन्द्र निर्मल