गोठ बात

अभिनय के भूख कभी मिटय नइ: हेमलाल

हास्य अभिनेता हेमलाल अउ विजय मिश्रा के गोठबात ‘भोजन आधा पेट कर दोगुन पानी पीवा, तिगुन श्रम, चौगुन हंसी, वर्ष सवा सौ जीवा।’ हंसना उत्तम स्वास्थ्य अउ लम्बा जीवन खातिर एक अरथ म बहुत बड़े ओखद आय। कवि काका हाथरसी के लिखे कविता के ए लाईन मन हर बतावत हावंय। हंसी हर बिना दुख तकलीफ […]

दोहा

दोहावली

1. चार चरण दू डांड़ के, होथे दोहा छंद । तेरा ग्यारा होय यति, रच ले तै मतिमंद ।।1।। विसम चरण के अंत मा, रगण नगण तो होय । तुक बंदी सम चरण रख, अंत गुरू लघु होय ।।2।। 2. दुखवा के जर मोह हे, माया थांघा जान । दुनिया माया मोह के, फांदा कस […]

अनुवाद

अनुवाद

1. कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय (मूल रचना – ‘‘कोशिश करने वालो की हार नही होती‘‘ मूल रचनाकार-श्री हरिवंशराय बच्चन ) लहरा ले डरराये  म डोंगा पार नई होवय, कोशिश करईया मन के कभु हार नई होवय । नान्हे नान्हे चिटीमन जब दाना लेके चलते, एक बार ल कोन कहिस घेरी घेरी […]

कविता गोठ बात

बूढ़ी दाई

पितर मन के पियास बर अंजरी भर जल साध बर, बरा-बबरा, सोंहारी संग हूम रंधनी खोली के खपरा ले उड़ावत धुंगिया बरा के बगरत महमहई लिपाये-चंउक पुराये ओरवाती म बगरे फूल ओखरे संग भुखाए लइका दूनो मन, अगोरत हावय कोन झकोरा संग, मोर बूढ़ी दाई आही. अउ बरा बबरा खवाही. संजीव तिवारी

कविता

नोनी

पढ़-लिख लिही त राज करही नोनी। नइते जिनगी भर लाज मरही नोनी॥ पढ़ही त बढ़ही आत्म विसवास ओकर दुनिया मा सब्बो काम काज करही नोनी। जिनगी म जब कोनो बिपत आ जाही, लड़े के उदीम करही, बाज बनही नोनी। पढ़ही तभे जानही अपन हक-करतब ल, सुजान बनही, सुग्घर समाज गढ़ही ोनी। परवार, समाज अउ देस […]

कविता

एक पाती सुरूज देवता के नाव

जग अंधियारी छा गे हवय, मन ला कईस उजियारंव गा। आ जतेस तै सुरूज देवता, बिनती तोर मनावंव गा॥ कारी अंधियारी बादर, हफ्ता भर ले छाय हवय, शीत लहर के मारे, देहें सरी कंपकपाए हवय। यहां मांग-पूस मं, सावन कस बरसत हे, कोन परदेस गे तैं, दरस नई मिलत हे॥ कतेक दु:ख ला गोठियावंय मय, […]

कविता

डॉक्टर दानी के बानी

( नगर निगम चुनाव) बस दु महीना बाद होवय्या हे हमर प्रदेस म निगम के चुनाव, तेन ला जीते बर रमन हा नवाकार्यक्रम बर मांगत हे सुझाव्। में हा जनता डहार ले उनला चुनाव जीते के तरीका बतावत हवं, सबले पहली प्रसासनिक खर्चा ला कम करव कीके समझावत हवं। अब सरलाता से बनना चाही जनता […]

कविता

पितर पाख

पितर पाख भर बिहनिया नदिया म कनिहा भर पानी म खड़े सोंचथंव ललियावत-करियावत जल ह कब उजराही. यहा तरा बाढ़त परदूसन ले आघू जब बजबजावत गंगा ह गंगा, अउ नदिया ह नदिया नइ रहि पाही. त कोन बेटा पानी देहे बर नदिया अउ गया जी म पिंडा, नैनी उतर के हाड़ा सरोए बर गंगा जाही. […]

गीत

पारंपरिक लोक गीत : मोर मन के मजूर

मोर मन के मजूर चले आबे नरवा करार म। नईं हे कोनों या मोरों सहारा, संग म जाथे तीर के जंवारा हॉ या तै हा आबे जरुर मोर मन के मजूर। नई सुहावै अन-पानी, कइसे के चलही जिनगानी। हौं या तैं आबे जरूर मोर मन के मंजूर। घरे म बइठ के सोचत रहिथौं, अंचरा म […]

कविता

का आदमी अस

अपन भासा के बोल न जाने, अपन भासा के मोल न जाने। जनम देवईया जग के पहिली, मॉ सबद के तोल न जाने।। पर भासा ल हितु मानथस।। झुंड म चले जिनावर हिरना, कीट पतंगा पंछी परेवना। संग भाई के चले न दु दिन, भूले, न पूछे पियारी बहना।। दाई ददा ल दुर भगाथस।। धरम […]