व्यंग्य

बियंग: अच्छे दिन

GGहे भगवान , मोर जिनगी म अच्छा दिन कब आही । कोन्हो मोला , पूछे – गऊंछे काबर निही ? कोन्हो बड़का मनखे मोर कोती झांक के काबर नि देखे ? में भूख , गरीबी अऊ बेरोजगारी के बीच जियत , असकटा गेंव । मोला उबार भगवान इहां ले । भगवान हांसिस । तैं झोपड़ी अस बेटा , अच्छा दिन तोर बर नोहे । तोर बांटा म जेन परे हे तिही ल समेट , अऊ उही म सुख खोज । तेंहा एकर ले अच्छा दिन के हिच्छा झिन कर । तोर भाग म , एकर ले अच्छा दिन पाये के सुख घला निये । झोपड़ी गोहनाये लागिस – मोरो अच्छा दिन आतिस , त महूं मंडल बन जतेंव । ओकरे मन कस दिखतेंव , पहिरतेंव ओड़तेंव , खातेंव पितेंव , टेस मारत किंजरतेंव । मुसकुरा दिस भगवान अऊ किहीस ‌- मंडल बनई तोर नसीब म निये , न मंडल संग तोर मेल घला निये । तें ओकर मन के बीच रेहे के कलपना , तियाग दे । मंडल घर के बइठक खोली म , तोर फोटू टंगाये रहिथे तिही म , तेंहा अपन भाग संहरा । झोपड़ी नि मानिस । भगवान मजबूर होगिस , एवमस्तू किहीस , अऊ चल दीस सुटुर सुटुर ।
दूसरेच दिन , झोपड़ी एक झिन मंडल के हाथ बेचा गिस । कुछेच दिन पाछू ,एक ठिन कार ओकर अंगना म रूकिस । सूट बूट म , महर महर महमहावत मण्डल , अपन गोड़ मढ़ाइस ईंहां । झोपड़ी के खुसी के ठिकाना नि रिहीस । भीतरी म खुसरतेच साठ , बोहारी धर के सफई सुरू होगे । कोंटा कोंटा ल बोहार डारिन । थोरकेच दिन म झोपड़ी तक सड़क बनगे । बिजली लग गे । पानी बर नल आगे । घरे म पेखाना घला बनगे । जम्मो डहर चकाचक होगे । झोपड़ी के नाव ले बैंक म खाता घला खुलगे । पइसा जमा होये के अगोरा होवथे । तीर तखार के झोपड़ी मन ओकर तरक्की ल देख , जरे लागिस ।
फेर , न चिरपोटी पताल संग धनिया चटनी के महक , न कोइला के आगी , न अंगाकर चुरे के कुहरा । न लइका के किलकारी , न महतारी के लरिया बोली । न राम न रमायन , गीता न कुरान । न भई बहिनी के मया , न बबा के दुलार , न मांदर के थाप , न ढोलक के धाप । कोन्हो परोसी आगी मांगे ल दूर , साग के ओखी , हाल चाल तक नि पूछय । उदासी आये लागिस हिरदे म ।
मंडल , दम ले अपन संगवारी मन संग पहुंच गे फेर । झोपड़ी सज गे । नावा नावा सोफा , नावा दीवान । सड़क ले खइरपा तक , लाली रंग के सुघ्घर कारपेट बिछ गे । झोपड़ी के आस जागिस फेर । फेर ये आस जादा टेम नि रहिगे । फोटका कस फूटे लागिस । उहां रेहे निही वोमन । आवय अऊ जावय रोज । आये तहन , तास के बिसात बिछय । ढोर डांगर कस खाना , मंद मउहा पीना । खाये पीये खेले के पाछू , आपस म बंटवारा के झगरा । घुरवा पटागे मंद मउहा के बोतल म ।
पहिली रथिया के अंधियारी , ओकर हिरदे म , परकास के अनुभौ कराए बर पुर जाये । अभू संझा के जगमग अंजोर , ओकर जिनगी म अंधियारी बगराये लागिस । अभू त हद घला नहाके लागिस । नरक बनगे झोपड़ी । रोज रोज लुका लुका के लामी लामा कार आए लागिस । रात ले -बिकाल ले , पहिर ओढ़ के रंगरेली मनावत मनखे मन ल देखके , झोपड़ी सरम के मारे बोजाये लागिस । करिया धन अइसने होथे , पहिली घांव जानिस ओहा । बड़ हतासा छागे हिरदे म । जुन्ना सुरता आये लागिस – टूटहा रचहा खटिया म बइठके , फूटहा कोप बसी म सुड़ुक सुड़ुक चहा पियत बबा के गोठ । चिरहा बोरा म पसर के , मही डारके , गोंदली , आमा अथान मिंझरा बटकी म बासी सपेटत नोनी के मुहूं , नजरे नजर म झूले लागिस । टिपिर टिपिर बरत नानुक चिमनी , अंधियारी ल डोहारत , जम्मो डहर बगरा डरे अपन अंन्जोर – अभू सपना कस होगे । वो समे , झोपड़ी , गरीब के घर रिहीस । कोन्हो मंडल के हाथ बेचाये नि रिहीस । अभू होटल कस होगे , सराय बनगे । वो समझगे – अच्छा दिन काये तेला । वो जान डरिस , अच्छा दिन के परिभासा । येहा सोज्झे राजनीतिक माटी के चिखला के सिवाये कहींच नोहे , जेमा , कमल फूल , सुख दे बर ललचाथे जरूर , फेर देवय निही । मने मन बुड़बुड़ाये लागिस । सुनही कोन । ये दिन के कामना त उही करे रिहीसे । वो नि जानत रिहीस , अच्छा दिन जियइया मन अइसने होथे कहिके । वो येला घला नि जानत रिहीस – के अच्छा दिन म छोटे मनखे के अऊ काये हाल होथे । उहू देखे ल मिलगे , एक दिन । छापा परगे झोपड़ी म । पकड़इन अब्बड़ झिन । फेर जम्मो छूटगे तुरते । फंस गे एक गरीब मनखे । वो गरीब इही झोपड़ी के जुन्ना मालिक आय , झोपड़ी के दुख सुन के , हाल चाल पूछे बर , आये रिहीस । बदनाम होगे दून्नो झिन ।
दूसरेच दिन , झोपड़ी ल टोरे बर , आगिन बनिहार मन । इहां लइसेंससुदा जुआंघर , सराबखाना अऊ वेस्यालय बनही । गरीब मनखे मरगे । झोपड़ी टूटथे । फेर , झोपड़ी ल का टोरही येमन , वो तो पहिली ले टूट चुके हे , भीतरी ले । ओकर आखरी बिदई के समे आगे । काठी उठगे दूनों के । मनखे संग जरत , झोपड़ी के लास के एकेक अंग के लरी , चिचिया चिचिया के बतावत रहय – तूमन झिन करहू अच्छा दिन के सऊंख । ये सिरीफ अमीर मनखे बर आय । करिया धन आही , तुंहर झोपड़ी ल चमकाही , ये कलपना ल तियाग देवव , निही ते हमरे कस बदनाम होहू । संगवारी मन संग छोर दिही । टूट टूट के बगर जहू , अउ , बिन समे आये , दुनिया ले बिदा हो जाहू । मसान घाट ले , अभू घला नरियावत हे , चिचियावत हे झोपड़ी । फेर कोन सुनही । दऊड़ चलतेच हे अच्छा दिन पाये बर ।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन
छुरा

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