व्यंग्य

चलती के नाम गाड़ी, बिगड़ गे त…




बहुत साल पहिली किसोर कुमार, असोक कुमार अउ अनूप कुमार तीनों भाई के एक ठन फिलिम आय रहिस हे- चलती के नाम गाड़ी। फेर वोखर बाद के लाईन ल कोनो नई बतावय। मैं बतावत हों चलती के नाम गाड़ी बिगड़ गे त खटारा।
टेटकू बैसाखू ल कार में घूमत देख के एक दिन महूं सोंचेव कि का मैं उंखरों बरोबर नइ हौं? तब मोर सुभिमान ह अपन आंखी खोलिस अउ सपना ले झकना के डर्राय लइका बरोबर जाग गेंव। मोर सुभिमान हा मोला धिक्कारिस, अरे सेकण्ड किलास आफिसर होय के बाद भी तोर जघा कार नई हे? मोला धिक्कार हे। टुरुर-टुरुर करत फटफटी में आथस जाथस। मोर अंदर अपने अपन एक प्रेरना आइस कि तैं हा नवा गाड़ी के औकात नई रखस। तब सेकेण्ड हेण्ड ले लंव। ये बात ह मोर मन ला भागे। नवा गाड़ी में नवा चलइया रहे से टूट-फूट के डर बने रहिथे। सेकण्ड हेण्ड गाड़ी हा ठोंका जथे तभो नई अखरय। अब मैं सोंच लेंव कि तीन महीना के तनखा सकेल के कार लेना हे। दानी महाराज ला फोन करेंव। महराज मोर बर बने असन सेकेण्ड हेण्ड कार देख के खरीद देतेस गा। इही बात अपन ननपन के संगवारी हरसेवक लाल ल घलो कहेंव। दूनों झन मोला बड़ कोसिन, तैं हा का सेकेण्ड हेण्ड गाड़ी खरीदत हस, नवा लेते ते हा। मैं कहेंव भाई मोर पोजीसन ला देखव यार, नोनी ह मेडिकल के अउ बाबू ह इंजीनियरिंग के पढ़ई करत हे। दूनों मिला के पौने चार लाख के सालाना खरचा हे। फेर बिहाव, फेर नौकरी, फेर साहर में घर। तब मोर जघा का बांचही तुहीं मन बतावव। बाढ़े नोनी के एकेक साल हा पांच किलो के बांट कस बाप के छाती में मढ़ा देथे। कब वोखर हाथ पिंवरा दौं कहि के चिंता लगे रहिथे। आज के खराब जमाना में होनी-अनहानी के बड़ डर लगे रहिथे।
वो मन मोर बर एक ठन गाड़ी देखिन अउ खरीदवा भी देइन। अलवा जलवा वो मन मोला कामचलाऊ गाड़ी चलाय बर घलो सिखा देइन। अब मैं कहेंव- चलौ न यार तीनों झन लांग ड्राइव में जाबो। वो मन सुनिन तब खलखला के हांसिन अउ कहिन लांग ड्राइव में तंै हा भाभी ल लेग जबे। मैं वो मन ला मिठई खवा के बिदा हो गेंव। गाड़ी में पहिली यात्रा मौली भांठा के करेंव। नरियर फोरेंंव अउ ठीक ठाक घर पहुंच गेंव। बाई हा मोर सुवागत करिस अउ मोरे टेस मारे के दिन आगे कहिके खुस होगे। पारा भर ल नरियर अउ पेड़ा बांट देंव। परोसी मन आ-आ के देखिन अउ बधई देइन। अब इतवार के दिन हमन अपन भांची के घर सिमगा जाय के मन बनाएन। नवा गाड़ी लेते तो मन अपन हितू पिरीतू रिस्तेदार घर एखर सेती जाथे ताकि वोमन ल पता चल जावै कि बाबू ह गाड़ी ले डरे हे। घूमे से ज्यादा गाड़ी के परचार वोखर मन के उद्देश्य रहिथे। मोर बाई ह तेरा सौ के साड़ी अउ पचास हजार के गहना लाद के तियार होगे। हमर गाड़ी हा सिमगा जाय बर निकल गे। मस्त गाड़ी में गाना सुनत-सुनत दूनों झन हंसी-खुसी जावत रहेंन।




सिमगा हा हमर गांव ले पचास कि.मी. दूरिहा हे। अब सिमगा के नदी आगे। नदिया के चढ़ाव चढ़त-चढ़त गाड़ी हा बंद होगे। बहुत कोसिस के बाद भी गाड़ी चालू नई होइस। उल्टा गाड़ी हा पछघुच्चा घुचत-घुचत पुल ले वापिस आ गे। दस मिनट के कोसिस के बाद भी गाड़ी चालू नई होइस। आघू-पाछू गाड़ी मन के लंबा लाइन लगेे। हारन उप्पर हारन बाजे बर धर लीस। एक झन टरक वाले सरदार हा मोर मेर आ के आंखी देखाय बर धरलीस। की गल है बास्सा? मैं कहेंव भाई साहब गाड़ी ह अचानक बंद होगे, चालूच नइ होवत हे। हमन दूनों झन बाहिर निकल गे राहन। मोर बाई कोती देख के कहिस बीबी टीपटाप रखे हो तो गाड़ी भी टीपटाप रखो न यार। मैं कहेंव नवा गाड़ी ए भाई साहब। ना जी ना हमें मत बनाओ। नई गड्डी हमने भौत देखी है। ये तो फोर्थ हेण्ड गड्डी है जी। आघू पाछू दूनों कुती जाम लगे के कारन हमन दूनों झन अजायब घर कस परानी हो गे राहन। सबो झन हमन ला देखे बर कहिस- पीछे देखिए। मैं बिना पाछू देखे आघू बढ़ गेंव। बारगांव पहुंच के गाड़ी ले उतरेंव अउ चपरासी ला कहेंव- अरे, इसमें पानी मार दे। धूल ज्यादा लग गई है। गाड़ी ला देख के चपरासी हा खलखला के हांस दीस। मैं पूछेंव-क्यों हंस रहा है? तब वो लजा के कहिस- कुछ नहीं साहब। मैं वोखर जघा खड़ा हो के देखेंव तब घुराहा कांच के अतलंगहा टूरा मन अंगठी से गाड़ी खटारा हे कोनो झन बइठहू लिख दे राहयं।
लकर धकर स्टॉफ के कोनो मनखे झन देख ले कहिके लिखना ल हाथे म मिटार देंव। आखिर इज्जत के सवाल रहिस हे। अइसे तइसे हर सात दिन में कभू हारन, कभू, लाइट, कभू पंचर, कभू कुछु टूट-फूट के सिकायत आय बर धरलीस। गाड़ी मेंटनेंस में वोखर कीमत के बराबर खर्चा हो गे राहय। अब मैं वापस फटफटी में ड्यूटी आय जाय बर धरलेंव। गाड़ी ल बेंच देस का जी? कहिके स्टॉफ वाले मन पूछयं। मैं कहेंव नहीं यार, गाड़ी ह घर में रखे हे, ये फटफटी ल मढ़ाय रखना ठीक नई हे, यहू तो चलत रहना चाही न? मोर मन मोला अंदर से हुदेना मारत राहय- बता दे न तोर गाड़ी हा खटारा हो गे हे कहिके, फेर मोर नामी कंपनी के बनियाइन हा कहिस चुप राह, ये अंदर के बात ए। आज भी वो गाड़ी हा ऐतिहासिक बन के मोर घर के बाहिर में खड़े (पड़े) रहिथे। मोर रामप्यारी हा मोर इज्जत ला बढ़ा देथे। जेन देखथे तेन मोला पइसा वाले समझथे। अब वोला रोज बिहनिया एक कि.मी. चलाथौं बाहिर बट्टा जाय बर वोखर उपयोग करथें, काबर कि एक कि.मी. से दुरिहा जाय के अब मोरो मन में बिसवास नई रहिगे हे। कब कते मेर रुक जही डर बने रहिथे। चलत गाड़ी ला देख के लोगन ला लगथे कि मोर गाड़ी हा चालू हालत में हे। एक झन लेवइया हो मेकेनिक धर के आय राहय। रोज बिहनिया मोर एके काम रहिथे, पारा मोहल्ला में सब के उठे से पहिली मोला उठे बर परथे। का बताववं जी रतिहा सुनसान में पारा के अतलंगहा टूरा मन गाड़ी के सब्बोकांच में खटारा लिख दे रहिथें। धुर्राय कांच में अंगठी के लिखना ह जग्ग ले दिखथे। गाड़ी के सबो काचं मन ल कच्चा फरिया में पोंछना मोर नित्य धर्म बन गे हे।
डॉ. राजेन्द्र पाटकर ‘स्नेहिल’