गोठ बात

भगवान शंकर के अनेक नाव

सावन आ गे संगवारी हो, ये मौसम धरती बर जरूरी हे । किसान मन बर जरूरी हे ।ये पूरा महिना हर भगवान शंकर के भी मन पसंद हे । “देवों के देव”महादेव के पूजा अराधना के बेरा हवे,हमार कतको संगी मन कांवर बोह के जल अरपन करे बर जाथे रेंगत रेंगत, अउ कतेक बहिनी मन उपास घलाव रहिथें। भगवान शंकर ला बेल पान आंक के फूल, धतूरा के फूल, फल, कच्चा दूध, जल, गंगा जल अरपन करे जाथे।
ऐ सब जिनिस हर भगवान शंकर के मनपसंद हवे। भगवान के बहुत अकन नाव हवे. जब समुद्र मंथन होय रिहिस त उहां ले अब्बड़ अकन जिनिस उफलाय रिहिस। जेनमा बिख घलाव रहय,ऐ हर धरती बर अलहन रहाय। जम्मो देवता ब्रमहा करा गोहारे लगिन। ब्रम्हा कहिन तुमन के अलहन ला खेदे के उपाय भगवान विष्णु करा हवे। तहां भगवान विष्णु के कहे अनुसार देवता मन भगवान शंकर के अराधना करे लगिन।तहां प्रसन्न हो के भगवान शंकर ओ बिख ला घोटक के अलहन ला सिरवाईन। तब ले भगवान शंकर के नाव नीलकंठ पर गिस।
भागिरथी हर अपन भाई मन के उद्धार बर गंगा ला धरती मां उतारे बर तप करिस. गंगा हर सरग मां रहय जी. अपन तप ले भागरथि हर सफल हो गे, फेर गंगा के बेग हर खूब रहय।जेमा धरती के एको कण नई बांचतिस. ऐ अलहन के नेवारन बर सरग ले आवत गंगा ला भगवान शंकर हर अपन जटा में झोंक लिन.



अव धरती छर्री दर्री होय ले बंचा लिन। तब ले भगवान के गंगा धर नाव पड़ गईस। भगवान शंकर के अनेक रूप हवे.. अउ सबे रूप मां पूजे जाथे। सबले आघू शिव लिंग हरे, जेला निराकार माने जाथे। तांडव मुद्रा हवे ए रूप हर भयंकर हे, जेला प्रलयंकारी घलाव कहे जाथे। भगवान शंकर के ध्यानस्थ मुद्रा घलाव हवे। शांतिपूर्ण मुस्कान रथे, उंकर ए स्वरूप मां माता पारबती अउ भगवान गणेश के संग बिराजे स्वरूप हर घर मां राखना परिवार बर अच्छा माने जाथे।
भगवान शंकर वरदान दे मा एकदम आगे हवे… कुछू भी मांग होवय, कोनों भी मांगय ओला देबे करथें। कोनों ला खाली हाथ नहीं फिरोंय। अउ ऐखरे बर भोले बाबा भोले भंडारी नाव धराईस। ब्रम्हाण्ड के उत्पत्ति ” ऊँ” अक्षर ले माने जाथे। ऐखर बिसय मा़ हमार पुरान मन में लिखाईस हवे….अउ भगवान शंकर ला “ऊँ” के प्रतीक माने जाथे तभे “ऊँकार” नाव पड़िस।

भारती वैष्णव
अम्बिकापुर
जिला – सरगुजा
छत्तीसगढ़