कविता

पितर के कउंवा

जेन घर मा दाई ददा ह,
जियत म आंसू बोहाही ग ।
ओ घर के तोरई भात,
हमला कइसे मिठाही ग ।।

बाई के बुध म दाई ददा ल,
कलप कलप के रोवावत हे ।
सरवन बनके उही मनखे,
गंगा म हाड़ा बोहावत हे ।।
ओ घर मा पितर मन
काबर लहुट के आही ग….। जेन घर…

जेन घर मा सम्मान सियान के,
आसीस देथे बाप महतारी ह।
ओ घर ह मंदीर बरोबर
परसाद हे बरा सोंहारी ह ।।
ऊही मनखे मन
पितर-लोक ल पाही ग…

राम कुमार साहू
सिल्हाटी, स.लोहारा
कबीरधाम
मो. नं.9977535388
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