कहानी

मुसवा के बिहाव

एक ठन गांव मा भाटा के बारी रहिस।ओमा किसिम किसिम के भाटा फरे रहिस। खई खाए के चकर म उही म बिला बनाके रहे लगिस।एति ओति किदरत मुसुवा कांटा के झारी म अरझ गे तहां ले ओकर गोड़ म बमरी के कांटा, बने आधा असन बोजागे। मुसुवा पीरा म कल्ला गे, एति ओति कुदत लागे कि कौउनो ए कांटा ल निकाल देतिस।पीरा म कल्लात मुसुवा ल न उ ठाकुर के दुकान दिखिस।नउ ल मुसुवा कहिस – ए भाई न उ ठाकुर – मोर गोड़ म काटा गड़गे हे, भारी पीरा म हंव, बमरी के कांटा ह बने आधा असन बोजागे हे, निकलत घलो नई हे? ओला तै ह निकाल देबे का ग? मु सुवा के के कल्ई ल देखके नउ घलो पसीजगे अउ मुसुवा के कांटा ल नहल्ली ले निकालिस।
मुसुवा भारी खुसी म चुई चुई करत मगन होगे, फेर चंट मुसुवा चंट ई दिखावत नहन्नी ल लेके भागे लगिस त नउ भागत मुसुवा मेर कहिस – अरे मुसुवा तोर पीरा ल देखके कांटा ल हेरेंव त तहिंच ह.मोर नहन्नी ल लेके भागत हस? मुसुवा आंखी ल ततेरत नउ मेर कहिस- सुन रे नउ ठाकुर – मैं गयेव भाटा बारी, उहां गड़ गयेव कांटा, मोर कांटा ल तै लेहे, त तोर नहन्नी ल मैं लेहेव, त एमा मोर काय दोस, नउ ठाकुर कहिस – भाग रे मुसुवा भाग। मुसुवा खोरात-खोरात रद्दा चलत ओला एक झिन ढोकरी मिलगे, ओह गहूं पीसवा के अपन घर डहर जावत रहिस, मुसुवा खोरात -खोरात ओकर तिरेच म पहुंचिस, अउ ओकर लुगरा के अंचरा ल घिंचत कहिस- ए सियानिन दाई सुन वो, तै ह कति जात हस? सियानिन कहिस, मैं दिन भर के खाए नई हंव गंहू पीसवाए चक्की गे रहेव, ए दे घर जाके चूल्हा बारके रोटी- पीठा बनाहूं।



सियानिन के पाछू- पाछू सरलग चलत मुसुवा कहिस- ए दाई एक ठन बात मोर मन म हवय ओला कहंव का? सुनबे का? !! सियानिन कहिस- ह हो कहि न मुसुवा, त मुसवा कहिस मोर बात ल मानबे त ठीक अउ नई मानबे त तोर इच्छा हे। सियानिन कहिस- ले भईगे लकर – धकर के बेरा म लटलट इ झन कर, जउन तोर मन म हे ओला कहि डार, फेर मोर फायदा के बात होही त काबर नई मानहूं। मुसुवा कहिस मैं ह एक ठन नहन्नी धरे हंव, बड़ किमती हे ओला मै ह तोहिच ल देहं, सोचत हंव, अतका सुनतेच बात के अंताजा लगाके ढोकरी के आंखी बरगे, तहां मुसुवा मेर कहिस – का होही बेटा दे देबे मोहिच ल, काबर बिन पनही के गांव के रद्दा म किंदरत रहिथव, रद्दा म अब्ड़ कांटा- खूंटी रहिथे, वो ह मोर गोड़ म गड़ जा थे, त नहन्नी रहही त काटा ल हेर लेहं, अउ एति- ओति जाए बर नई परही, अइसना गोठियावत – गोठियावत घर.पहुंच गे। सियानिन चूल्हा बारके रोटी- पीठा बनाए म जरगे। तहा रोटी खाए के बाद म मुसुवा नहन्नी ल सियानिन ल दे दिहिस, अउ जतका बाहंचे रोटी ल सकेलके भागे लगिस। भागत मुसुवा मेर सियानिन कहिस- ए मुसुवा तै कइसे जउंर करत हस? जम्मो रोटी मन ल लेके कइसे भागत हस? त पलट के मुसुवा कहिस- सुन वो सियानिन- मैं ह गयेव भाटा बारी उहां गड़ गयेव काटा, मोर कांटा ल नउ लिहिस, त ओकर नहन्नी ल मैं ह लेहे, मोर नहन्नी ल तै लेहे त तोर रोटी ल मैं ह लेहे, त एमा मोर काय दोस?!! तेला तै ह बता, अतका सुनके सियानिन कहिस- जा रे मुसुवा भाग।अब तोर चंटइ के काय गोठ कहंव।अतका म मुसुवा खोरात खोरात जाए लगिस, तहं ले तरिया पार म बराती मन ल देखके, मुसुवा दूल्हा के तिर म पहुचगे, बराती मन दिनभर ले खाए- पीए न इ रहे, भूख पियास म कलइ माते रहिस। ए बात के अंताजा लगाके मुसुवा दूलहा मेर गइस अउ कहिस- ए भाइ तै ह अउ दूल्ही ह दिन भर के खाए नई हवव, मोर मेर रोटी हवय खाहू का? अतका सुनतेच दूनो परानी खुस हो गई न, अउ मगन होके रोटी ल खवाईच बुता करिन।



एति मुसुवा दूल्ही ल लेके भागे लगिस, येला देखके दूल्हा जंगागे अउ कहिस-मुसुवा रे, मुसुवा, तै ह इसे अलकरहा काम करत हस? कइसे तै मोर सुवारी ल लेके भागत हस, मुसुवा कहिस- सुन भाई मैं ह गयेव भाटा बारी, उहां गड़ गयेव काटां, मोर काटा ल नउ लिहिस ओकर नहन्नी ल मैं लेहे मोर नहन्नी ल सियानिन लिहिस, ओकर रोटी ल मै लेहं, मोर रोटी ल तै लेहेव, तोर दूल्ही ल मैं लेहेव, त मोर एमा काय दोस? एला तै बता!!!
दूलहा कहिस, जा रे मुसुवा, तोर चंटइ तोहिच ल फबे। मुसुवा खोरात दूल्ही ल लेके घर आइस, दूल्ही कति देखके कहिस, कस वो तोर चुदीं ह बनेच लम्मा अउ बड़ सुग्घर हे, अइसनेच मोर घलो होतिस त कतका अच्छा होतिस। दल्हि कहिस, रे मुसुवा लइक इ पन ले बिहाव होवत तक मोर दाइ ह मोर चुदीं ल बढाए सेती रोज ढेकी म कूटके, सग्घर ककवा म कोरे। फेर तैं ह अइसनहा चाहथस त फेर तोला अइसनहा करें बर परही त तोर चुदीं घलो बढ़ जाही।
मुसुवा कहिस ठीक ठीक बता, अइसनहा करहूं त सितो बड़ जाही ना, दूल्ही कहिस, सित्तो कहत हंव।
दूसर दिन मुसुवा बिहनिया ले असनान करके तियार होगे। अउ ढेकी करिया म जाके, ढेकी तरी अपन मुडी़ ल दता दिहिस।अतका म दूल्ही ह ढकर ढकर ढेकी ल कूट दिहिस। उहींच मेर मुसुवा ढप्प ले होगे। कचकच ले कचरागे। दूल्ही मारे खिलखिलावत खुसी म बइहा असन नाचत अपन घर कोति रेंग दिहिस। मुसुवा जादा चटइ सेती ओकर परान पखेरू उडागे, एकर सेती कहेगें कि मनखे ल जरूरत ले जादा चंटइ नइ करे बर चाही, ओकर दूरगति मुसुवा असन होथे।
दार भात चूरगे दाइ के कहानी पूरगे….

गीता शर्मा
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