कविता

नेता मन नफरत के बिख फइलावत हे

1
नेता मन नफरत के बिख फइलावत हे,
मनखे ला मनखे संग गजब लड़ावत हे.
धरम-जात के टंटा पाले, सुवारथवस,
राम-रहीम के झंडा अपन उठावत हे.
अँधियार ले उन्कर हावय गजब मितानी,
उजियार ला कइसे वो बिजरावत हे.
उच्चा-टुच्चा , अल्लू-खल्लू मनखे मन,
नेता बन के इहाँ गजब इतरावत हे.
चार दिन कस चंदा कस हे जिन्कर जिनगी
‘बरस’ उन्कर बर, रात अंधियारी आवत हे.

2
नेक-नियत मा खामी झन कर,
जिनगी ला निलामी झन कर.
अपने सुवारथ बर तैं हर,
दुनिया ला बदनामी झन कर.
सुभिमान के जिनगी जी ले,
पर के तैं गुलामी झन कर.
अपने पाँव रद्दा रेंग ले,
अगुवा ला सलामी झन कर.
बहकइया कतको हे इहाँ,
‘बरस’ कहत हे हामी झन कर.

बलदाऊ राम साहू
9407650457