गीत

मोर सोन चिरईया अउ मोहन के बाँसुरिया : गीत

मोर सोन चिरईया

हाय रे मोर सोन चिरईया।
परत हँव मँय तोर पईया।।

जिनगी हा मोरे हे उधार।
हो जाही तन हा न्योछार।।

उगती के हे सुरुज देखव,
दाई तोर बिंदिया बरोबर।
डोंगरी पहाड़ मा छाए,
हरियर हे लुगरा बरोबर।।

अरपा अउ पैरी के धारी।
गंगा कस नदिया प्यारी।।

गोड़ ला धोवत हे तुम्हार।
पावन धुर्रा ले तोर सिंगार।।
हाय रे मोर सोन चिरईया।
जिनगी हा ………………

आमा के मउर हा झुले,
कुहु कुहु कोयलिया बोले।
मन मोरो नाचय गावय,
हिरदे मा अमरित घोले।।

फुलवा परसा के लाली।
होगेंव मँय तो मतवाली।।

बसंत के उड़त हे बहार।
आजा पिया तैं घर हमार।।
हाय रे मोर सोन चिरईया।
जिनगी हा………………
तर्ज :- कजरा मोहब्बत वाला



मोहन के बाँसुरिया

मोहन के बाँसुरिया,सुनावत हे बिहनिया।
कनिहा लचकावय,जावथे राधा पनिया।।
मोहन के…….

बेनी डोलत हावय, हँसीं मुस्कावत हे।
जमुना के रसता मा,कइसे इतरावत हे।।
आभा मारे मोहना, बजाए मुरलिया।
मोहन के……..

गघरी लुकाए अउ,अब्बड़ सतावत हे।
पनिया भरन बेरा,बड़ा वो तरसावत हे।।
मया मा फँसाए,दउड़त आवय रधिया।
मोहन के……..

राधा के चुनरी उड़ावय, गली खोर मा।
बही बने घुमत हावय,बँधे मया डोर मा।।
मने मन मा गुनत,बितावत हवय रथिहा।
मोहन के…….

बोधन राम निषाद राज
सहसपुर लोहारा, कबीरधाम (छ.ग.)
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