कविता

दिखय नही ओर-छोर, त का करन

दिखय नही ओर-छोर, त का करन,
पिरात हे पोर-पोर त का करन।
दु – दू पइसा जोड़ेन जिनगी भर,
सबो ल लेगे चोर, त का कारन।
सबो ल हम अपने सही जानेन,
नइ लेवे कोनो सोर त का करन।
नइ सुहाय अब तो सुआ- ददरिया
गजब करत हे शोर त, का करन।
अब बदलगे दुनिया के चाल चलन,
भट गे नवा अंजोर, त का करन।
जिनगी के आस बुतागे अब तो,
जिनगी लागे निपोर, त का करन।

बल्‍दाउ राम साहू
त का करन= तब क्या करें, पिरात हे= पीड़ा से भरा है, पोर-पोर= गाँठ-गाँठ, नइ करय= नहीं करते, कोनो=कोई सोर=सुरता /याद, नइ सुहाय=अच्छा नहीं लगता, भटगे=विलुप्त हो गया,नवा=नया,अंजोर =प्रकाश,बुतागे =बूझ गया/समाप्त हो गया । निपोर =व्यर्थ ।