महाकाव्‍य

श्री राम कथा (संक्षिप्त) सती मरन

मइके पहुंचिन सती नहीं कउनो गोठियाइन,
देख देख बहिनी मन भी मुच ले मुसकाइन,
दाई भर हा हली भली पूछिस दुख पाके,
हाथ गोड़ धोयें बर पानी देइन लाके।।1।।
मुसकावत लख बहिनी मन ला सती लजागे,
संकर जी के कहे गोठ के सुरता आगे।
देख अपनल अपमान बान छाती मा लागिस,
मया मोह के अंधियानी अंतस ले भागिस।।2।।
जरत रहय दाती भुरभुर मइके मा रइके,
मन मा बांधित ढ़ाढ़स गुपचुप कसनो करके।
दाई भर गोठियावय बेटी संग हहा के,
मन मा सोंचय आइस अइसन जोग कहां के।।3।।
बने जग्ग के ठउर सती जब देखिन जाके,
सिव के रहय न भाग, कहिन मन मा दुख पाके।
मोर अछत अपमान पिता करथें संकर के,
दे देवतन ला भाग सबों के आदर करके।।4।।
संकर के अपमान नइ देखंव ये तन मा,
‘‘जग्ग कुंड मा कूद त्यागिहंव’’ ठानिस मन मा।
रिस करके अस कहिन, सुना जे जग मा आये,
आपन-आपन भाग जग्ग के सब झन पाये ।।5।।
पिता न संर जी ला जग मा नेवता देइन,,
अपन बड़प्पन के सब झन ला परिचय देइन।
कर उनकर अपमान जग्ग मा भाग न हेरिन,
बेर भाव राखे के अइसन अपजस लेइन।।6।
सुन के बात सती के अइसन,
अपन मूंद ले कान।
एक नहीं सौ बेर बखिनहंव,
कर-करके अपमान।।9।।
सुनित बात अस सती दक्ष के,
जर बन होगे आगी।
मान मा कहिन न सूझे चिटकों,
हावय निचट अभागी।।10।।
येकर फल ला पेट अद्या के,
पाहा तूंं अस कहके।
जग्ग कुंड मा कूद परिन झट,
लगा ध्यान संकर के।।11।।
मचगे हा हाकार जग्ग मा,
तिड़ी बिड़ी सब भागिन।
आपुस मा सब प्रजा पतो ला,
गारी देये लागिन ।।12।।
डर के मारे सब झन थर थर कांपे लागिन,
अब का होही कह-कह मन मा सोंचे लागिन।
संकर के अपमान करे के अब फल पाही,
दक्ष प्रजापति जीयत भर रह रह पछताही।।13।।
एक दूत संकर सो जाके,
हाल बताइस जग्ग के।
सती मरन सुन संकर भोला,
कांपिन गुस्सा करे।।14।।
जाके करा बिधंस जग्ग ला,,
बोलिन भोला संकर।
होनहार ला सीस नवाइन,
मन मा झअ धिरजा धर।।15।।
कर देइन बिधन्स जग्ग ला,
दूत पहुच झट अग्या पाके।
भोला ला अहाल बताइन,
द्रक्ष उहां रहगे पछता के ।।16।।
मरन जान के सती नारि के,
भोला के आंखी भर आइन।
धन धन लीला धारी कह कह,
लीला मय ला सीस नवाइन।।17।।
दक्ष प्रजापति पदवी पाके,
बइहा अस बउराइस कइसे।
मद मा आ करथे उजार मन,
ला मतवाला हाथी जइसे।।18।।
जब जेकर जात्ती आ जाथे,
वोकर बुद्धि मठा जाथे।
काम बिगड़ जाथे पाछू,
मूड़ पटक के पछताथे।।19।।
पारवती के जनम
होवत रइथे नित दुनिया मा
कठपुतरी कस नाच।
कउन कहय का सांच।।1।।
जुर मिर के सब संग चला,
ये जिनगानी के सार।
नदी-नाव संजोग इहा के,
वोहत सब मझधार।।2।।
बइठ गइन संकमर समाध मा,
दुनिया ला लेक बैराग।
ध्यान लगाइन इष्ट देवा मा,
मया मोह ममता ला त्याग।।3।।
सोरठा-संकर के घर ध्यान,
रहिन प्रान त्यागे सती।
धन्य भाग ला मान,
जनम लिहिन गिरिराज घर।।4।।
जब ले सती हिमालय के घर आइन जनम लिये गर,
तब ले उहां हिमालयपुर मा छागे आनंद घर घर।
राजा-रानी, परजा-जाकर सब मिल खुसी मनावंय,
रानी ला देखे बर अहवाती मन जुरमिल आवंय।।5।।
आगे सुखदाई बसंत रितु बन पहार होगे हरियर,
रूख लदागे पान फूल मा भंवरा गूं जिन गुन-गुन कर।
कोइलीं कूकंय कुहू कुहू खुखी मना अमरइया मा,
कुक्कुट कुक्कुट अयरी बोलंय पुरइन बीच तरइया मा।।6।।
नंदिया, नरवा, तला, पोखरी के पानी फरियागे,
खेतखर भांठा टिकरा के बन झुरकुर हरियागे।
चिरई चिरगुन नाचंय गावंय जुरमिल खुशी मनावंय,
देख देखकर फूल डार मा झूल-झूल सुख पावंय।।7।।
अमइया मा आमा मौरिन भंवरा जा मडरावंय,
पिहो-पिहो कह पपिता व्याकुल रह पिया बलावय।
टेस फूलिन लाल लाल बन के भीतर बड़ सुन्दर,
हरिना-मिरगा-कोलिहा लमहा करंय खेल जंह भीतर।।8।।
जूड़-जूड़ महभई पवन जा जा के लगाय जगाये
रोज बिहनिया नवा संदेसा लाला नित सुनावे।
सूरूज देवता लाल रंग छींचय संगहाती बेरा,
देख देख चिरइ्र के चिरगुन रूख मा करंय बसेरा।।9।।
जीव जन्तु घर बन पहार मा,
नवा उमंग भरेय आके।
धरती मा सुख सांत छा गइस,
सुघ्घर रितु बसन्त पाके।।10।।
बसती लागय गझिन जनम दिन लकठा आगे,
होवय सुघ्घर सगुन खुसी के बादर छागे।
आवंय जांवय चतुरा नाती राजा के घर,
कब लइका अवंतरय यही मन अभिलाखा कर।।11।।
सुभदिन सुघ्घर लगन घड़ी मा,
राजा के घर जनमिस कइना।
देख देख के अपन भाग ला,
सहारावय अब रानी मयना।।12।।
राजा घर दाई अनपुरना,
लेइस आ अंवतार जहां।
सुख सउंपत ला कउन बखनय,
बरखा होइस बिकट तहां।।13।।
बाढ़े लागिस नित चन्दा अस,
रात चरगुना दिन दूना।
देख देख के राजा-रानी मुंंह चूमंय,
बाढ़य सुख दूना।।14।।
पृथ्वी के परजटन करत नारद मुनि आइन,
लइका के अवंतार सुनिन मन मा सुख पाइन।
नोनी ला पा के राजा नारद सो आइन,
पांव परित अउ लइका ला झट गोड़ गिराइन।।15।।
उठा तुरनतु वो ला नारद मुनि मुसकाइन,
खोजत रहंय हरस बर जस वो ही ला पाइन।
चंदा अस मुंह देखदेख के देखत रहगें,
आंखी टरिन न टारे ले एक टक्कू लग गें।।16।।
मन मा करिन प्रनाम कहिन ‘‘राजा बड़ भागी’’
कइना के अंजोर मुंह जइसन बरथे आगी।
तंुहरो नांव इहां अब अम्मर होगे रानी,
देखब मा तो लगथे ये होही गुनखानी।।17।।
हांथ जोर जब कहिन हिमाचल,
लड़की के गुन दोष बतावा।
लिखे भाग मा का हे येकर,
गुन-गुन के मुनि सब अरथावा ।।18।।
नारद मुनि मुसकात कंहिन ‘‘राता सुन लेवा’’
लड़की मा गुनेच गुन हे नइये कछू मेवा।
पारबती, अंबा, जगदंबा अउ अनपुरना,
गौरी गौरी सती सिरामनि उमा अपरना।।19।।
नाव अनेक उजागर होके,
पति के होही निचट पियारी।धरती मा खोजे नइ मिलही,
येकर अस पतिबरता नारी।।20।।
ये तो होगे गन कइना के,
अवगुन अब दू चार बताहंव।
सुन के जेला जी दुख पाही,
सोंच सोंच मन मा पछताहव ।।21।।
लिखे भाग मा येकर बर बरम्हा बर बइहा,
घर दुवार नइ डेरा जेकर रूख के छंइहा।
छाई ददा खूट कुल के कुछ नहीं ठिकाना,भेख बनाये असुीा न घर खये बर दाना।।22।।
भूत परेत डाकनि सांकनि जेकर संग मा,
चुपर राख मरघअ के जे नित आपन अंग मा,
डमरू बाजा बजा नाच बइहा बन जाही,
भांग धतूरा कोचिला महुरा जे नित खाही।।23।।
घर मा भूंजे भांग न जेकर मुसवा लांघन परही,
चेन्दरा तक नइ तन ढाके बर बड़का दानी बनही।
सुन नारद के गोठ सुखागे दूनो राजा-रानी,
सोंच सोंच मारे दुख के आंखी भर आइस पानी।।24।।
लिखा भाग के नहिच मेटावय,
होथे निसयच वो गुन लेवा।
दसा देखर राजा रानी के,
नारद कहिन चिटुक सुन लेवा।।25।।
जतका अवगुन अीाी बखानें,
सब्बेच सिव संकर मा हावय।
सब अवगुन हर गन हो जाहीे,
पारवती जो येर पावय।।26।।
संकर जीला पाये के हावय,
रानी बड़ विकट समइसा।
निरविकार भोला बइठे हैं,
ले समाधि कर कठिन तपइसा।।27।।
पारवती जो करय तपइसा,
पाये बर पति संकर भोला।
हे विचित्र संकर के लीला,
मिलही संका नइये मोला।।28।।
तप के बल मा बरम्हा हर सृष्टी रच लेथे,
तप के बल मा बिस्नू सब के पालन करथें।
तप के बलमा सिव संकर परलय कर देथे,
तप, बले सेस मूड़ ऊपर बरमांड धर लेथे।।29।।
अनहोनी होनी हो जाथे,
तप के बल मा सुना हिमालय।।30।।
मोर कहे मन आही जो तौ,
पारबती जा करय पतइसा।
निसचय मिलहीं सकर ये ला,
हल हो जाही बिकट समइसा।।31।।
अतका कह मुसकावत गावत,
नारद बरम्हा लोक गाइन।
नारद मुनि के कहे गोठ सुन,
राजा-रानी दुखी भइन।।32।।
रानी कहिन तुरत राजा सो,
नारद मुनि का कहिन बतावा।
अटपट गोठ समझ नइ पायें,
एकक ठन मोला समझावा।।33।।
बिटिया के गन दोष देख के,
अटपटहा सब बात बताइन।
अइसन गोठ दुटप्पी कहिके,
काबर वो मन ला भमाइन।।34।।
पारवती के तपइसा
रानी मयना रहंय अकेल्ला,
एक दिन अइसन मउका पाके।
दाई के कोरा मा बइठिस,
पारवती अंगना ले आके।।1।।
देखिस पारवती ला रानी,
चूमिस मुंह ला बड़ दुलार कर।
लेइस छाती मा रपोट,
अरझे माला के सुधार लर।।2।।
देख देख सुकुमार देह ला,
बेटी के रानी दुख पाइस।
सुरता करके गोठ मुनी के,
आंखी मा आंसू भर आइस।।3।।
पारवती झट कहिस देख,
आंसू मयना के आंखी मा।
काबर दाइ्र दुःख करत हस,
भर भर आसू आंखी मा।।4।।
दसा देख राजा रानी के,
नारद कहिन चिटुक सुन लेवा।।5।।
जतका अवगुन अीाी बखानें,
सब्बेच सिव संकर मा हावय।
सब अवगुन हर गन हो जाही,
पारवती जो येकर पावय ।।6।।
संकर जी ला पाये के हावय,
रानी बड़ बिकट समइसा।
निरविकार भोला बइठे हें,
ले समाधि कर कठिन तपइसा।।7।।
पारवती जो करय तपइसा,
दाये बर पति संकर भोला।
हे विचित्र संकर के लीला,
मिलही संका नइये मोला ।।8।।
तप के बल मा बरम्हा हर सृष्टी रच लेथे,
तप के बल मा बिस्नू सब के पालन करथे,
तप के बलमा सिव संकर परलय कर देथे,
तप, बल सेस मूड़ ऊपर बरमांड धर लेथे ।।9।।
अनहोनी होनी हो जाथें,
तप के बल मा सुना हिमालय।।10।।
मोर कहे मन आही जो तौ,
पारबती जा करय तपइसा।
निसचय मिलहीं संकर ये ला,
हल हो जाही बिकट समइसा।।11।।
अतका कह मुसकावत गावत,
नारद बरम्हा लोक गइन।
नारद मुनि के कहे गोठ सुन,
राजा-रानी दुखी भइन।।12।।
रानी कहिन तुरत राजा सो,
नारद मुनि का कहिन बतावा।
अटपट गोठ समझ नइ पायें,
एकक ठन मोला समझावा।।13।।
बिटिया के गन दोष देख के,
अटपटहा सब बात बताइन।
अइसन गोठ दुटप्पी कहिके,
काबर वो मन ला भरमाइन ।।14।।

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