महाकाव्‍य

श्री राम कथा (संक्षिप्त) सती मोह

हे गनेस भगवान तोर मैं ध्यान धरत हंव,
पारबती के लाल सरन आ पांव परत हंव।
नाव लिये ले प्रथम काम सब होथें पूरा,
बिना दया रह जाथे सामी काम अधूरा।।1।।
‘नाथ’ दास आये हे अब तो राख सरन मा,
बट्टा आये देहा झिन भगवान परन मा।
अपने भाखा मा लिक्खें के साहस करिहंव,
राम नाव लेके कहिथंव भवसागर तरिहंव।।2।।
सरस्वती माता तंुहार मैं सुमरन करके,
बीना पुस्तक घर रूप ला हिरदय धर के।
सोच हब दाई कुछ लिख के समें बिताहंव।
लिखथीं कविता कह सब सो ठग-ठग गोठियाहंव।।3।।
भुलवारे बर दाइ्र निच्चट चंचल मन ला,
मिहनत ले बरकाये बर ये कायर तन ला।
एक पइत निहार देये हस जेला दाई,
हो जाथे ओकर पबरित मन छूट के कर्ॉ।।4।।
अपन देख मनसूीाा दाई,
मन मा लगथे लाज।
तेकर खातिर गोहरावत हंव,
आके कंठ बिराज।।5।।
गुरू के चरन कमल ला करके,
सरधा ले परनाम।
राम चरित के कथा लिखत हंव,
सुमरन कर हरिनाम।।6।।
घेरी बेरी छमा मांगथें,
हाथ जोर हे तुलसी दास,
चोरी कर कर कथा-भाव ला,
लाये हंव मैं कर बिसवास,।।7।।
मानस लिख बूड़त डोंगा ला,
करम-धरम के लिया उबार
हिन्दी हिन्दू लगहा रइहीं
जब ले रइही ये संसार।।8।।
छत्तीसगढ़ मा जनम मोर मैं निच्च्ट अड़हा,
जनंव नहीं कुछुच हावय अभिलाखा बढ़िहा।
तभ्भो होही पूरा तोर भरोसा कर के,
बिनवत हंव भगवान तोर पद-पंकज धरके।।9।।
कहिहौं गिरहस्थी के जीवन के सुघर कहानी,
जेमा दुख सुख के नित किंदरथ इसथे घानी,
कभू खुसी मा बाजत रइथे सुखद बधाई,
कभू दुःख मा रोना गाना मचथे भाई।।10।।
एक समे के बात बतावौं तेरता जुग जब आइस,
पर बरम भगवान दया कर मानुख तन धर आइस।
राजा दसरथ के घर जनमिन, जग मा भइन उजागर,
पार करे बर डहर बताइन मानुख ला भवसारगर।।11।।
अपन ददा के हुकुम मान के रामलखन दउ भाई,
करत रहंय वनवास संग मा लेके सीता माई।
बलदा लेये के खातिर लंका के रावन राजा,
खोजत रहय दाव पापी चिटको नइ करिस मुलाजा ।।12।।
लखनलाला ला छोड़ कुटी मा कपटी मिरगा मारे,
गइन राम झट वाकर पाछू अपन कांम संवारे,
मिरगा मरगे बान लगत हा लिछमन आ’ पापी कह,
सीता सुन के लखनलाल ला भेजिन जा देखा कह ।।13।।
सुन्ता कुटिया पाके रावन सीता ला हर लेगे,
अपन नंगई के परिचय अस रामलखन ला देगे।
मिरगा मार लहुट के आइन कुटिया देखिन सुन्ना,
‘सीता-सीता कहाँ-कहाँ कह होगे दुख दुन्ना।।14।।
राम-लखन खोजत सीता ला रहंय जात वन भीतर,
वो ही समे सती संग लेके आत रंहय सिव संकर।
देख राम के दसा महादे मन मा कह मुसकाइन,
‘धन लीला करवइया प्रभु तू’ कह के सीस नवायइन।।15।।
सीस नवावत संकर ला लख सती करिन संका मन,
सब ले बड़का महादेव, कहथें अइसन देवता मन।
खोजें तिरिया राजा के लइका बइहा अस रो-रो,
संकर भोला सीस नवाइन समझ न आइस मोरों।।16।।
जान गइन संकर भोला झट मन के बात सती के,
संकर हांसत कहिन मरम जाने बर सती-मती के।
संका हावय चिटको जाके लेवा अभी पीरच्छा,
जेमा झटपट भरम मेटावय होवय पूरा इच्छा।।17।।
तुरते राजी होगे तिरिया बुद्धी समझ न पाइन।
दुरिहा जाके झटपअ आपन सीता रूप बनाइन।
जउन डहर ले राम-लखन सीता ला खोजत आइन,
सीता भेख सतो रसदा मा राम-लखन सो आइन।।18।।
सीता भेख सती ला लख के तुरते राम लजाइन,
‘जय जगदंबा मता’ जय-जय कहके सीस नवाइन,
कहां गइन भोला संकर आये हा इहॉ अकेल्ला,
अरधांगी संकर क काबर करथा अइसन लिल्ला।।19।।
सुनके अइसन बात राम के, मन मा सती लजागे,
संवर के जो कहे न मानिन वोकर फल वा पागे,
आंखी दूनों मूंद बइठगें मन अब भ्रमित होगे
जान गइन हा कपट भेख कह देंह सिथिल सब होगे।।20।।
आइन जहां अगोरत संकर रहंय, डेरावत मन मा,
खेत न चिटकों, भुरभुरात दांवा लागे तनम ा।
हांसत संकर कहिन, बतावा कइसे लिया परिच्छा,
मन के संका मेटा गइस का होइस पूरा इच्छा ।।22।।
आपन गलती सती लुका के मारिन फेर लाबारी,
‘लिये परिच्छा कुछू नहीं में’ करे दरस त्रिपुरारी।
महूं नवाये सीस दरस कर, जइसन रहा नवाथे,
तंुहर कहे मा पारबरम के दरसन कर फल पायें।।23।।
अंतस के जनवइया संकर,
सब लो तुरते जान गइन।
‘जउन करेहा प्रभु के इच्छा’
मन मा संकर हांस कहिन ।।24।।
संकर के बात सुन सती पछताइन मन मा,
ब्याप गइस बीछी कस झार तुरन्ते तनम ा।
सोंच-सोंच के सती निचट धिरजा ला खोइन,
गलती अपने मान अधिजिया मन मा होइन।।25।।
जांवर-जोड़ी नता टूटगे,
सती भेख सीता के लेइस।
जबरन के कलंक ले लेइस।।26।।
बइठिन नंदिया बइला ऊपर,
संकर-सती गइन कैलास।
लगा समाधि संकर बइठिन,
सती देखके भेइन उदास ।।27।।
सती सोंच निज करनी ला रह-रह पछतावंय,
ढाढ़ास दे दे के आपन मन ला समझावंय।
मैं नइ जातें लिये परिच्छज्ञ जो हठ करके,
काबर ये मउका आतिस अस दुःख करेके ।।28।।
अंतरजामी संकर सो जो,
करे कपट वोकर फल पायें।
राम-लखन ला तिरिया बुध के,
कइसन बिनहारी दे आयें ।।29।।
सती विचारी रहय तियाकुल,
यहीं सोंच का परके।
अपन बुद्धि के निन्दा कर-कर,
धिक्कारय रह-रह के ।।30।ं।
दक्ष प्रजापति के जग्य
लगा समाधि संकर भोला,
करिन तपइसा महा अखंड।
दक्ष प्रजापति पदवी पाके,
मद मा आके भइत उडंड।।1।।
जगा करे बर देवता मन ला नेवता देइस,,
रकम रकम के चीज बस्त उच्छव बर जोरिस।
बरग्हा-बिस्नू-महादेव ला छोड़ सबेला,
दूत भेज बलवाइस देखे बर ये मेला ।।2।।
बट्ठे रहंय सती जब संकर जी के आगू,
देखिन उड़त बिमान गगन मा पाछू आगू।
टूटिस जब समाध तब संकर भोला जागिन,
हाथ जोर के सती चरन धर पूछे लागिन ।।3।।
जात कहां देवन बिमान मा आपन चड़,
एक एक ले साजे हावं सुध्धर अड़बड़।
संकर कहिन दक्ष राजा हे जग्ग रचायें,
नेवता दे दे देवता मन ला हवंय बलाये ।।4।।
करिन मोर सती तंुहला नेवता नइ देइस,
बेटी के सब मया मोह ला बिसरा देइस।
पदवी पा जाये ले सबला उसने होथे,
दुख आये ले छाती पीट पीट के रोथें ।।5।।
मद मा परके बड़े-बड़े ग्यानी बउराथें,
आपन निजी नता-गोता सब ला बिसराथें।
अपने मन के होनी अनहोनी सब करथें,
भल अन भल नइ सूझय मद मा माते रहथें ।।6।।
सती हो गइन चुप्प बात सुनके संकर के,
कहे लगिन तुरते मन मा कुछ धिरजा धर के।
‘‘जग देखे बर जाये देता, मैं हो आतें’’
दाई – बहिनी – सगा देख छाती जुडवाते ।।7।।
संकर कहिन बिना नेवता नइ फभय सयानी,
मोर समभ मा जाये ले होही हित होनी।
जावा जो जाये बर तू जब जिद्द करत हा,
सगा समंधी देखे के लालसा करत हा।।8।।
गोठ न समझिन संकर के जायं,
वर झटपट भइन तियान,
मुसकावत संकर कर देइन,
दूत सती संग मा दू चार।।9।।
होनहार हर होवे करथे,
चाहे लाख उपाय करा,
बिना बलाये जबरन आथ,
चाहे कतकों बांध धरा।।10।।

कपिल नाथ कश्‍यप