महाकाव्‍य

श्री राम कथा (संक्षिप्त) मंगला चरण

राम तुंहर हे काव्यमयी सुचि चरित धरा मा,
पति बरता के अमरित कलसा सिय अँचरा मा।
बहिस जहां ले कतक काव्य के सुरसरि धारा,
नवा सोत नित निकलत रइथे न्यारा न्यारा ।।1।।
महूं राम-सीता के बारंबार चरन धर,
अपन आखरी जीवन के सब ला अरपन कर।
काव्यमयी गंगा मा अब अवगाहन करिहंव,
मन के आखिर मनसूभा ला पूरा करिहंव ।।2।।
राम चरित के बड़े-बडे़ पोथी लिख डारिन,
तब ले पंडित, ज्ञानी, कवि मन लिख-लिख हारिन।
दिया बतावव सुरूज देव ला मोर लिखई,
जान समझ के तब ले हंव में करत ढिठाई।।3।।
हो जाही संतोस अपन बोली मा लिखके,
नइयें हरख बिखाद कहे मा अच्छा खिखके।
इनये एमा काव्य छंद रस कविता के गुन,
सुनवइयन के मन रिझ जाथे जेमन ला सुन।।4।।
तभ्भों ले बिसवास राख के अपन मन मा,
रंच न राखें कुछुच लुका के चौथेपन मा।
एक्को झन तो राम कथा ला पढ़ अपनाहीं,
मोर लिखे के भूती सब मोला मिल जाही।।5।।
गा-गा के तो कतक तर गइन,
सुन्दर चरित उदार।
मोरो मन मा सरधा होइस,
लिखतें चरित तुहांर।।6।।
जनम देवइया महतारी जो,
गोठ सिखाइस राम।
वोहिच बोली भाखा मा लिखए
पाइस मन बिसराम।।7।।
छत्तीसगढ़ हर जनम भूमि ये,
छत्तीसगढ़ी सुभाखा।
पढ़वइयन ला संउप हो गइस,
पूरा सब अभिलाखा ।।8।।
रहवइया में गंवई गांव के,
चिटको नइये बोध नगर के।
तभ्भे ले मैं करें ढिठाई,
लिक्खे बर मन मोढ़स करके।।9।।
जहाँ जनम ले बाढ़े पउढ़े।
जनम भूमि सुभ पवना गाँव।
खायें, पीयें, अन-जल जेकर,
लिखिहंव राम-कथा, ले नाव।।10।।

कपिलनाथ कश्यप