महाकाव्‍य

श्री राम कथा (संक्षिप्‍त) पारवती के तपइसा

रानी मयना रहंय अकेल्ला,
एक दिन अइसन मउका पाके।
दाई के कोरा मा बइठिस,
पारवती अंगना ले आके।।1।।
देखिस पारवती ला रानी,
चूमिस मुंह ला बड़ दुलार कर।
लेइस छाती मा रपोट,
अरझे माला के सुधार लर।।2।।
देख देख सुकमार देह ला,
बेटी के रानी दुख पाइस।
सुरता करके गोठ मुनी के,
आंखी मा आंसू भर आइस।।3।।
पारवती झट कहिस देख
आंसू मयना के आंखी मा।
काबर दाई दुःख करत हस,
भर भर आसू आंखी मा।।4।।
होनहार तो होबेच करही,
का होही अब रोये ले।
मोर समझ मा काम बिगड़ही,
सुघ्घर मउका खोये ले।।5।।
मोर कहे जो मन आ जातिस,
मोला भेज तपइसा बर।
मोर लहुट के घर आवत ले,
दाई मन ला मोढ़स कर।।6।।
जा के करिहंव कठिन तपइसा,
संकर आसन डगमग होही।
जिध मा परके संकट सहिहंव,
मुनि के बचन अवस फुर होही।।7।।
राजा ला दाई समझा दे,
परही झिन बाधा अब येमा।
मुनि के गोठ उतर, मोरो
पूरा अभिलाखा होवय जेमा।।8।।
परबती के गोठ एक दिन रानी चालिन,
सुन के राजा मन मा अबड़ अचंभो मानिन।
जो नोनी निसचय कर लेइस बन जाये बर,
कहिन मुनी के गोइ बताये मा सरधा कर।।9।।
जाके करय तपइसा वो अब संकर जी के,
मिल जाही बरदान अवस मनभावत जी के।
सत सनेह नोनी के जो संकर बर होही,
निसचय करके संकर ओकर साध पुरोही।।10।।
बिदा मांग के पारबती चल देइस बन मा,
रंग रंग के करत तरकना आपन मन मा।
बन अखंड के भीतर तप मा बइठिस जाके,
पान पताई कांदा कूसा बन के खाके।।11।।
एक गोड़ मा ठाढ़े करिस तपइसा भारी,
पन फूल फर छांड़ निच हो निरा अहारी।
बेरा कब ऊवय कब बूड़य गम नइ पावय,
हे संकर, हे संकर रट-रट सीस नवावय।।12।।
सांस सांस मा पारवती के,
संकर के ना लेत।
रहगे अब वोला चिटको नइ,
तन-तन के कुछु चेत।।13।।
देंह सुखा के कांटा होगे,
करत तपइसा भारी।
मुंह अंजोर आगी अस दगदम,
बरै जथा चिनगारी।।14।।
अइसन करत बहुत दिन बीतिस,
तब अकास बानी होइस।
बइठे रहय जहां गौरी सुन,
के वोला अचरज होइस।।15।।
ये अकास बानी, गौरी जा,
सुफल मनसुभा होगे,
संकर भोला तोला मिलहीं,
सिद्ध तपइसा होगे।।16।।
मन मा लहरा उठिस खुसी के,
मारे पारबती के।
देखे लागिस डहर-बाट
झरना एती ओतो के।।17।।
आके इहां सप्त रिसि मिलहीं,
तब अकास सुभ बानी ला।
रिसतो मान लहुट घर जाहा,
राजा संग रजधानी ला।।18।।
सुन अकास बानी होइस,
अब तो मन मा धिरजा गिरजा के।
खड़े मंझनिया निचट पियासू,
पानी के लकठा जस पाके।।19।।

कपिल नाथ कश्‍यप