कहानी

चिरई चिरगुन अतका तको नईये, वाह रे मनखे

एसो के देवारी गाँव गे रेहेव, गाँव जाथव त तरिया म नहाय के अलगे मजा रहिथे, अईसे लागथे बुड़ के नहाबे त कभू तरिया में नहाय नई रेहेव। नाहवत नाहवत मोर नजर तरिया पार के बंभरी के रूख म गिस जेमे पड़की चिरई ह खोंदरा बनाय रहाय, खोंदरा म दू ठक पिला ह चोंच ल […]

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कहानी : अंधविसवास

असाढ के महिना में घनघोर बादर छाय राहे ।ठंडा ठंडा हावा भी चलत राहे ।अइसने मौसम में लइका मन ल खेले में अब्बड़ मजा आथे। संझा के बेरा मैदान में सोनू, सुनील, संतोष, सरवन, देव,ललित अमन सबो संगवारी मन गेंद खेलत रिहिसे। खेलत खेलत गेंद ह जोर से फेंका जथे अऊ गडढा डाहर चल देथे […]

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खूंटा म साख निही, गेरवा के का ठिकाना

तइहा तइहा के गोठ। धरमतरई तीर नानुक गांव धंवराभांठा, जेमे रामाधीन नाव के मनखे रहय। ओकर दू झिन बेटा आशा अऊ कातिक। परबतिया अऊ रामाधीन अपन दूनों लइका ल एके बरोबर पालीन पोसीन अऊ एके बरोबर सिकछा दीकछा घला दीन। काकर दई ददा जिनगी भर साथ निभाथे, रामाधीन सरग चल दीस। समे बीते ले, लइका […]

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लोककथा : अडहा बइद परान घात

एकठन गांव म एकझिन लइका रहय। वोहा एक दिन दूसर गांव घूमे बर गीस। रद्दा म वोहा देखिस के ऊंट ह बगुला खात रहय अउ बगुला ह वोकर नरी म फंसगे। ऊंट ल सांस ले म तकलीफ होय लगिस। वोहा भुईंया म घोलंड के छटपटाय लागिस। अतका देखके ऊंट के मालिक ह एकझन बइद ल […]

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अपन-अपन समझ

बरसाती दोपहरी म अपन अंगना के परछी म सुभीत्ता बइठे-बइठे दयावती सोचत रहिस- ‘तीजा, हमर मन के सबसे बडे तिहार। ए बछर के तीजा म..।’ दयावती ल एक-एक बात, अपन हिरदय म आरी चले कस लागय। ए दारी नवा कालोनी के नमिता अउ पुरानी बस्ती के अचला तीजा म मइके नइ जा सकिन। त वोला, […]

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अपन सुवारथ रईही त मोहलो मोहलो

आज के समे मा कोनों ककरो नई होवय ग, कोन हितवा ये कोन बईरी ये काकर सुवारथ कामे हे समझ नई परयI बिना सुवारथ के कोनो मनखे ककरो तीर नई ओधय, अईसने मोला लागथेI अब देख ले गाँव मा पिछलेच सरपंच चुनई के गोठ आय, सरपंच बने बर नंदलाल भाई ह पूछत पूछत घर आवय,भिलई […]

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कहिनी : बमलेसरी दाई संग बैसाखू के गोठ

नवरात के बाद के इतवार के बडे बिहनिया बैसाखू ह ऊपर बमलाई पहुंचिस त बमलेसरी दाई वोला देखतेच बोलिस- ये दारी बड दिन म आए तेहा बैसाखू ! कहुं गांव- आंव चल दे रहे का? बैसाखू अचरज म पड गइस- कइसे कहिथस दाई? येदे नवरात म तो मेहा आय रहेंव। अइ…। बमलेसरी दाई, बैसाखू ले […]

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नान्‍हे कहिनी : दुकालू

जब कभु मोला कहुं जाना होथे त मेहा बुर्जुग दुकालु के रिक्सा मेहि जाथंव। दुकालू से जब कोनो वोकर उमर पूछथे त वोहा इही कहिथे के उमर के बात छोडो बाबू, मेहा तो ए मानथंब जब तक सेहत बने हे, तभे तक जिंदगानी हे। दुकालु ह कभु अपन उमर के रोना नइ रोय। वोकरे सब्द […]

अनुवाद कहानी

दूसरइया बिहाव

जब मेहा अपन चार बछर के बेटा रामसरूप ला बने तउल के देखथंव, त जान परथे के वोमे भोलापन अउ सुनदरई नई रहि गे, जउन दू बछर पहिली रिहिस हे। वो अइसे लागथे जाना-माना अपने गुस्सेलहा बानी म लाल आंखी मोला देखावत हे। वोकर ये हालत ला देख के मोर करेजा कांप जथे अउ मोला अपन […]

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लोककथा : कउंवा करिया काबर होईस

एक बखत के बात आय। एक झन मुनि के कुटिया म एकठन कौआ हे तऊन सुग्घर मुनि के तीर म रहिके जूठा-काठा खावत अपन जिनगी ल पहावत रहय। कहे जाथे कि ओ बेरा म कौआ के तन हा सादा रिहिस हे। एक दिन मुनि हा कौआ ल कहिथे, ‘हे कौआ मय तोर बर एक ठन […]