व्यंग्य

हाथी बुले गांव – गांव, जेखर हाथी तेखर नाव

नाव कमाय के मन, नाव चलाय के संऊख अउ नाव छपाय के भूख सबो झन ल रथे । ये भूख हर कउनो ल कम कउनो ल जादा हो सकथे, फेर रथे जरूर । एक ठन निरगुनिया गीत सुने बर मिलथे – नाम अमर कर ले न संगी का राखे हे तन मं । कतकोन झन […]

व्यंग्य

अब बिहाव कथे, लगा के देख

केहे जाथे कि जन्म बिबाह मरन गति सोई, जो विधि-लिखि तहां तस होई । जनम अउ मरन कब, कहां अउ कइसे होही ? भगवान हर पहिली ले तय कर दे रथे । वइसने ढ़ंग के बिहाव कब, कहां अउ काखर संग होही ए बात के संजोग भगवान हर पहिली ले मढ़ा दे रथे । फेर […]

व्यंग्य

इही तो आजादी आय

गनपत अउ धनपत दुनो झन रेडियो सुनत बइठे राहंय । रेडियो हर नीक-नीक देसभक्ति के गीत गावत राहय अउ बोलत राहय कि हमर आजादी साठ बरीस के होगे । तब गनपत हर धनपत ल पूछथे कि- रेडिया हर अजादी ल साठ बरीस के होगे कथे फेर हम तो आज ले ओखर दरसन नइ करे हावन […]