व्यंग्य

चलती के नाम गाड़ी, बिगड़ गे त…

बहुत साल पहिली किसोर कुमार, असोक कुमार अउ अनूप कुमार तीनों भाई के एक ठन फिलिम आय रहिस हे- चलती के नाम गाड़ी। फेर वोखर बाद के लाईन ल कोनो नई बतावय। मैं बतावत हों चलती के नाम गाड़ी बिगड़ गे त खटारा। टेटकू बैसाखू ल कार में घूमत देख के एक दिन महूं सोंचेव […]

व्यंग्य

मिसकाल के महिमा

मोबाइल आए से लइका सियान सबो झन मुंहबाएं खडे रहिन हे। जब देखव, जेती देखव गोठियाते रहिथे। जब ले काल दर ह सस्ता होइस तब ले किसिम-किसिम के चरचा शुरु होगे हे। सारी के भांटो से, प्रेमका के प्रेमी से, आफिसर के करमचारी से, शादीशुदा के ब्रह्मचारी से, घरवाली के घरवाले से, अऊ घरवाले के […]

व्यंग्य

लव इन राशन दुकान

पिक्चर देखइया मन मोला गारी देवत होहू के लव इन टोकियो, लव इन पेरिस- असन महूं हा लव इन रासन दुकान- शीर्षक में लिख दे हौं, फेर का करबे घटना ओइसनेच हे, के मोला लव इन रासन दुकान लिखे बर परगे। दू साल पहिली के फ्लैशबुक आप मन ला लेगत हौं। रासन के दुकान के […]

व्यंग्य

मेछा चालीसा

मैं पीएचडी तो कर डारे हंव अब डी-लिट के तैयारी में हौं। मोर विषय रही ‘मेंछा के महिमा अऊ हमर देस के इतिहास’ मोला अपन शोध निर्देशक प्रोफेसर के तलाश हे। कई झन देखेंव पर दमदार मेंछा वाले अभी तक नई मिले हे। मेंछा ह शान के परतीक आय अऊ दाढ़ी ह दृढ़ता के। मेंछा […]

व्यंग्य

चलव चली ससुरार

एच.एम.टी. के भात ल थोकिन छोड़ दीस अउ मुंह पोंछत उठगे। दुलरवा के नखरा देख के मैं दंग रहिगेंव। जेन दुलरवा ह दू रुपिया किला वाले चाउर के भात खाथे वोह एचएमटी के भात ल छोड़ दीस। साल भर में एकाध बार आमा खावत होही तेन ह आमा ल वापिस कर दीस। जिल्लो के दार […]

कहानी

फरहार के लुगरा अउ रतिहा के झगरा

एक बार वर्मा जी के घर गे रेहेंव। वर्मा जी ह अपन सबो लइका मन बर एके रंग के कुरता अउ एके रंग के पेंठ बनवा दे राहय। देवारी के भीड़ में भी वर्मा जी के लइका मन कलर कोड से चिनहारी आवय। अइसे लगय जइसे सबो झन एके इसकूल के पढ़इया लइका आयं। मैं […]

कविता

कबिता : कइसे रोकंव बैरी मन ल

पांखी लगाके उड़ा जाथे जी, कइसे रोकंव बैरी मन ला।छरिया जाथे मोर मति जी, घुनहा कर दीस ये तन ला।उत्ती-बूड़ती, रक्सहूं-भंडार, चारो मुड़ा घूम आथे।जब भी जेती मन लागथे, ये हा उड़ा जाथे॥मन ह मन नई रहिगे, हो गे हे पखेरू।डरत रहिथौं मैं एखर से, जइसे सांप डेरू॥इरखा के जहरीला नख हे, छलकपट के दांत […]